ईमान एक ऐसी दौलत है जो इंसान के दिल को सुकून और ज़िंदगी को मक़सद अता करती है। लेकिन इंसान होने के नाते, हमारे जज़्बात और ख्यालात हमेशा एक जैसे नहीं रहते। कभी हम खुद को रूहानी तौर पर बहुत मज़बूत महसूस करते हैं, तो कभी दुनिया की मसरूफ़ियात और परेशानियों के बीच दिल में एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगती है। यह उतार-चढ़ाव एक इंसानी फ़ितरत है और इससे घबराने के बजाय अल्लाह की तरफ़ रुजू करना ही असल कामयाबी है।
दिल में ईमान और ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव
हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी चुनौतियों से भरी होती है। कभी काम का बोझ, कभी रिश्तों की उलझनें और कभी अपनी ज़ात को लेकर उठने वाले सवाल हमारे दिल की हालत पर असर डालते हैं। इस्लाम हमें सिखाता है कि ईमान कोई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, बल्कि यह एक सफ़र है। इस सफ़र में कभी रास्ता साफ़ होता है और कभी धुंध छा जाती है।
अक्सर हमें लगता है कि शायद हम ही अकेले हैं जो कमज़ोर महसूस कर रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि दिल की कैफियत का बदलना इबादत और दुआ की अहमियत को और बढ़ा देता है। ईमान की मज़बूती का मतलब यह नहीं है कि आपके ज़हन में कभी कोई सवाल न आए या आप कभी उदास न हों, बल्कि इसका मतलब यह है कि हर हाल में आपका भरोसा अल्लाह की ज़ात पर कायम रहे।
इस्लाम ईमान की मज़बूती को कैसे समझता है
इस्लाम में ‘हिदायत’ (guidance) और ‘इस्तिक़ामत’ (steadfastness) दो बहुत अहम लफ़्ज़ हैं। हिदायत अल्लाह का वह नूर है जो वह अपने बंदे के दिल में डालता है, और इस्तिक़ामत उस नूर पर जमे रहने का नाम है। अल्लाह तआला जानता है कि इंसान का दिल बहुत नाज़ुक है, इसीलिए उसने हमें दुआ का तोहफ़ा दिया है।
दुआ सिर्फ़ अपनी ज़रूरतें माँगने का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्लाह के साथ एक गहरा ताल्लुक़ जोड़ने का ज़रिया है। जब हम ‘ईमान की मज़बूती की दुआ’ माँगते हैं, तो असल में हम अपनी आज़िज़ी (humility) का इक़रार कर रहे होते हैं कि ऐ अल्लाह! मेरे दिल का सुल्तान तू ही है, और तू ही इसे हिदायत पर साबित रख सकता है। यह यकीन ही दिल को सच्चा सुकून और इत्मीनान बख्शता है।
ईमान की मज़बूती के लिए पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अक्सर यह दुआ माँगा करते थे। यह दुआ दिल की साबित-क़दमी और ईमान पर कायम रहने के लिए सबसे मोतबर (authentic) ज़रिया है।
Arabic Dua
يَا مُقَلِّبَ الْقُلُوبِ ثَبِّتْ قَلْبِي عَلَى دِينِكَ
तलफ़्फ़ुज़
या मुक़ल्लिबल क़ुलूबि थ़ब्बित क़ल्बी अला दीनिक।
Roman (Hinglish)
Yaa Muqallibal qulubi thabbit qalbii ‘alaa diinik.
तर्जुमा
“ऐ दिलों को फेरने वाले! मेरे दिल को अपने दीन पर साबित-क़दम (मज़बूत) रख।”
Masdar (Reference)
जामी अत-तिर्मिज़ी (Sunan al-Tirmidhi: 2140) – सहीह हदीस।
एक और बहुत प्यारी और जामे (comprehensive) दुआ कुरआन मजीद में ज़िक्र की गई है, जो हिदायत की हिफ़ाज़त के लिए बेहतरीन है:
Arabic Dua
رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا وَهَبْ لَنَا مِن لَّدُنكَ رَحْمَةً ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ
तलफ़्फ़ुज़
रब्बना ला तुज़िग़ क़ुलूबना बअ-द इज़ हदय्तना वहब लना मिल-लदुन-क रह़-मतन इन्न-क अन्तल वह्हाब।
Roman (Hinglish)
Rabbana la tuzigh qulubana ba’da idh hadaytana wa hab lana mil ladunka rahmatan innaka antal wahhab.
तर्जुमा
“ऐ हमारे रब! हमारे दिलों को टेढ़ा न होने दे इसके बाद कि तूने हमें हिदायत दी है, और हमें अपने पास से रहमत अता फ़रमा, बेशक तू ही सब कुछ अता करने वाला है।”
Masdar (Reference)
सूरह आल-इमरान, आयत 8 (Surah Ali ‘Imran, 3:8)।
दुआ के साथ ईमान का इत्मीनान
ईमान की मज़बूती के लिए दुआ करना पहला और सबसे अहम क़दम है, लेकिन इसके साथ अपने दिल की ज़मीन को भी तैयार रखना ज़रूरी है। जब हम अल्लाह से दुआ करते हैं, तो हमारे अंदर एक उम्मीद और यक़ीन पैदा होता है। यह यक़ीन हमें सब्र सिखाता है।
अल्लाह पर भरोसा रखने का मतलब यह है कि हम अपनी कमियों के बावजूद उसकी रहमत से मायूस न हों। इल्म हासिल करना, अच्छी सोहबत में बैठना और अल्लाह का ज़िक्र करते रहना दिल की सख़्ती को दूर करता है। याद रखिए, ईमान की मज़बूती कोई रातों-रात होने वाला करिश्मा नहीं है, बल्कि यह हर रोज़ की जाने वाली एक कोशिश है जिसमें दुआ आपका सबसे बड़ा सहारा बनती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या ईमान का कम या ज़्यादा महसूस होना आम बात है?
जी हाँ, यह बिल्कुल फ़ितरी (natural) है। यहाँ तक कि सहाबा-ए-किराम भी अपने ईमान की फ़िक्र किया करते थे। दिल की कैफियत का बदलना इस बात की दलील है कि आप अपने ईमान को लेकर बेदार (aware) हैं। ऐसे में परेशान होने के बजाय ‘या मुक़ल्लिबल क़ुलूब’ वाली दुआ कसरत से पढ़नी चाहिए।
क्या ईमान की मज़बूती की दुआ रोज़ाना की जा सकती है?
बिल्कुल। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम यह दुआ बहुत कसरत से किया करते थे। इसे अपनी पंज-वक्ता नमाज़ों के बाद या चलते-फिरते अपना मामूल बनाना दिल को सुकून और हिदायत पर साबित रहने में मदद देता है।
आख़िरी बात
ईमान की हिफ़ाज़त और इसकी मज़बूती अल्लाह तआला का एक अज़ीम अता (gift) है। हम अपनी मेहनत से ज़्यादा अल्लाह के फ़ज़ल पर भरोसा रखते हैं। जब भी दिल में बेचैनी हो या ऐसा महसूस हो कि हम भटक रहे हैं, तो निहायत आज़िज़ी के साथ अपना सर सजदे में रख दें और अल्लाह से उसकी रहमत और हिदायत माँग लें। वह बहुत मेहरबान है और अपने बंदों की पुकार को कभी अनसुना नहीं करता। अल्लाह हम सबके दिलों को अपने दीन पर साबित रखे और हमें ईमान की हक़ीक़ी मिठास नसीब फ़रमाए। आमीन।


