Jahannam Ki Aag Se Bachne Ki Dua | अल्लाह से पनाह और नजात की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

जहन्नम (दोज़ख़) की आग से बचने की दुआ

رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ
तलफ़्फ़ुज़:
रब्बना आतिना फिद्-दुनिया हसनतंव-व फ़िल-आख़िरति हसनतंव-व क़िना अज़ाबन्नार।
तर्जुमा:
ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई अता फ़रमा और आख़िरत में भी भलाई अता फ़रमा और हमें आग (जहन्नम) के अज़ाब से बचा।
मसदर: 
क़ुरान मजीद, सूरह अल-बकराह (2:201)
jahannam ki aag se bachne ki dua

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इंसान की ज़िंदगी में कई ऐसे मोड़ आते हैं जब वह अपनी हकीकत और अपने आने वाले कल यानी आख़िरत के बारे में सोचता है। यह एहसास कि हमें एक दिन अपने खालिक (पैदा करने वाले) के पास वापस लौट कर जाना है, हमारे दिल में एक अजीब सी बेचैनी भी पैदा करता है और साथ ही सुकून की तलाश की तरफ भी ले जाता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि आख़िरत की फ़िक्र का मतलब डर कर सहम जाना नहीं है, बल्कि अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाना और अल्लाह की रहमत का उम्मीदवार बनना है।

जब हम jahannam ki aag se bachne ki dua के बारे में सोचते हैं, तो असल में हम अल्लाह की पनाह और उसकी हिफ़ाज़त मांग रहे होते हैं। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हम कमज़ोर हैं और अल्लाह की मदद के बिना कुछ भी नहीं।

Insaan Aur Aakhirat Ka Khayal

आख़िरत का ख्याल आना इस बात की निशानी है कि अल्लाह ने आपके दिल को ज़िंदा रखा है। यह एहसास कि हमारी हर छोटी-बड़ी कोशिश का हिसाब होगा, हमें ज़िम्मेदार बनाता है। लेकिन इस फ़िक्र में हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि अल्लाह की रहमत उसके ग़ुस्से पर भारी है।

जब एक बंदा अल्लाह के सामने झुकता है और कहता है कि “ऐ अल्लाह, मैं अपनी कमज़ोरियों का इकरार करता हूँ और तुझसे पनाह चाहता हूँ”, तो यही वह पल होता है जब वह अल्लाह के सबसे करीब होता है। अल्लाह अपने बंदों को सज़ा देने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सीधे रास्ते पर चलाने और अपनी रहमत के साये में रखने के लिए दुआओं का तोहफ़ा देता है।


Islam Mein Khauf Aur Umeed Ka Tawaazun

इस्लाम में एक मुसलमान की कैफियत वैसी ही होती है जैसे एक परिंदे के दो पंख—एक पंख ‘ख़ौफ़’ (अल्लाह का डर) है और दूसरा ‘उम्मीद’। अगर एक भी पंख कमज़ोर हो जाए, तो परिंदा उड़ नहीं सकता।

  • ख़ौफ़ का मतलब: अल्लाह की नाराज़गी का डर। यह डर हमें गलत कामों से रोकता है।
  • उम्मीद का मतलब: अल्लाह की रहमत और माफ़ी का भरोसा। यह उम्मीद हमें मायूसी से बचाती है।

Jahannam ki aag se bachne ki dua मांगना इसी संतुलन को ज़ाहिर करता है। हम जहन्नम से इसलिए डरते हैं क्योंकि हम अल्लाह की रहमत खोना नहीं चाहते, और दुआ इसलिए मांगते हैं क्योंकि हमें यकीन है कि वह पुकारने वाले की पुकार सुनता है। अल्लाह ताला का इरशाद है, “मेरी रहमत हर चीज़ पर छाई हुई है।”


Jahannam Ki Aag Se Panah Maangne Ki Masnoon Duas

हदीस और कुरान में ऐसी कई दुआएं मौजूद हैं जो हमें अल्लाह की पनाह में आने का तरीका सिखाती हैं। यहाँ हम दो सबसे मोतबर (authentic) दुआएं ज़िक्र कर रहे हैं:

1. कुरान की दुआ (सूरत अल-बकराह)

यह दुआ सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली दुआओं में से एक है, जिसमें दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई मांगी गई है।

Arabic Dua:

رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):

रब्बना आतिना फिद्-दुनिया हसनतंव-व फ़िल-आख़िरति हसनतंव-व क़िना अज़ाबन्नार।

Roman (Hinglish):

Rabbana atina fid-dunya hasanatan wa fil-akhirati hasanatan waqina ‘adhaban-nar.

तर्जुमा:

ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई अता फ़रमा और आख़िरत में भी भलाई अता फ़रमा और हमें आग (जहन्नम) के अज़ाब से बचा।

मस्दर (Source):

क़ुरान मजीद, सूरह अल-बकराह (2:201)


2. नबी-ए-करीम (ﷺ) की सुन्नत दुआ

हुज़ूर (ﷺ) अक्सर अल्लाह से जन्नत का सवाल करते और जहन्नम से पनाह मांगते थे।

Arabic Dua:

اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْجَنَّةَ وَأَعُوذُ بِكَ مِنَ النَّارِ

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi):

अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुकल जन्नता व अऊज़ु बिका मिनन्नार।

Roman (Hinglish):

Allahumma inni as’aluka-l jannata wa a’udhu bika minan-nar.

तर्जुमा:

ऐ अल्लाह! मैं तुझसे जन्नत का सवाल करता हूँ और आग (जहन्नम) से तेरी पनाह चाहता हूँ।

मस्दर (Source):

सुनन इब्ने माजह (Sunan Ibn Majah: 3846), सहीह हदीस।


Dua Ke Saath Amal Aur Umeed

दुआ सिर्फ लफ़्ज़ों का नाम नहीं है, बल्कि यह दिल की एक कैफियत है। जब हम जहन्नम से पनाह मांगते हैं, तो हमारे दिल में यह इरादा भी होना चाहिए कि हम उन कामों से दूर रहेंगे जो अल्लाह को नापसंद हैं।

दुआ के साथ-साथ छोटे-छोटे नेक अमल जैसे कि किसी की मदद करना, सच बोलना और अपने अख़लाक को अच्छा रखना भी नजात का ज़रिया बनते हैं। याद रखें, अल्लाह आपकी कोशिशों को देखता है, न कि आपकी कामिलियत (perfection) को। वह जानता है कि इंसान से ग़लती हो सकती है, इसीलिए उसने तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला रखा है।


Short Q&A

सवाल: क्या जहन्नम से बचने की दुआ रोज़ पढ़ी जा सकती है?
जवाब: जी हाँ, बिल्कुल। हुज़ूर (ﷺ) ने सुबह और शाम के ज़िक्र में पनाह मांगने की तालीम दी है। इसे रोज़ाना पढ़ने से दिल में आख़िरत की याद बनी रहती है और अल्लाह पर भरोसा मज़बूत होता है।

सवाल: क्या सिर्फ दुआ ही काफ़ी होती है?
जवाब: दुआ इबादत का मग़ज़ (brain) है। दुआ हमें अल्लाह से जोड़ती है और सही काम करने की ताकत देती है। दुआ के साथ अपनी तरफ से नेक कोशिशें करना भी ज़रूरी है, लेकिन आख़िरी भरोसा अल्लाह की रहमत पर ही होना चाहिए।


आख़िरी बात

आख़िरत की फ़िक्र हमें अंधेरे की तरफ नहीं, बल्कि अल्लाह के नूर की तरफ ले जानी चाहिए। Jahannam ki aag se bachne ki dua मांगना असल में अल्लाह से मोहब्बत का इज़हार है कि हम उससे दूर नहीं होना चाहते। जब भी आप यह दुआ मांगें, तो पूरे यकीन और दिल की आज़ज़ी के साथ मांगें।

अल्लाह बड़ा करीम है, वह अपने बंदे की पुकार को कभी खाली नहीं लौटाता। उसकी रहमत का दरवाज़ा हर उस शख्स के लिए खुला है जो सच्चे दिल से पनाह मांगता है। अपने दिल को सुकून में रखें, अल्लाह पर भरोसा रखें और उसकी रहमत की उम्मीद को कभी हाथ से न जाने दें।