Kisi Musalman Se Milne Ki Dua | किसी मुसलमान से मिलते वक़्त की दुआ

Quick Guide
मुख़्तसर रहनुमाई

किसी मुसलमान से मिलते वक़्त की दुआ

السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ
तलफ़्फ़ुज़:
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू
तर्जुमा:
आप पर अल्लाह की सलामती, उसकी रहमत और उसकी बरकतें हों।
मसदर: 
सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम
kisi musalman se milne ki dua main

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Musalman Se Milte Waqt Islam Kya Sikhata Hai

जब एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से मिलता है, तो यह मुलाक़ात सिर्फ दो लोगों का मिलना नहीं होता, बल्कि यह आपसी भाईचारा और अल्लाह की रहमत का ज़रिया होता है। इस्लाम हमें सिखाता है कि मिलते वक़्त हमारे दिल साफ़ हों और हम एक-दूसरे की ख़ैरियत के साथ-साथ भलाई की भी उम्मीद रखें।

सलाम करने और दुआ देने की असल नीयत यह होनी चाहिए कि हम सामने वाले भाई या बहन के लिए अल्लाह से सलामती माँग रहे हैं। इससे न सिर्फ आपस में मुहब्बत बढ़ती है, बल्कि हमारे रिश्ते भी सुन्नत के मुताबिक़ मज़बूत होते हैं। यह एक सादा और आसान तरीक़ा है जिससे हम अपनी रोज़ाना की मुलाक़ातों में सुन्नत को शामिल कर सकते हैं।


Kisi Musalman Se Milte Waqt Kya Kehna Sunnat Hai

इस्लाम में किसी मुसलमान से मिलते वक़्त सबसे अहम चीज़ सलाम है। इसके बाद हाथ मिलाते वक़्त एक छोटी और मसनून दुआ भी पढ़ी जा सकती है। नीचे दिए गए कलिमात सुन्नत से साबित हैं:

1. सलाम (सबसे पहली सुन्नत)

सलाम करना मुलाक़ात की शुरुआत का सबसे बेहतरीन तरीक़ा है।

Arabic:

السَّلَامُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ

तलफ़्फ़ुज़:

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू

Roman (Hinglish):

Assalamu Alaikum Wa Rahmatullahi Wa Barakatuhu

तर्जुमा:

आप पर अल्लाह की सलामती, उसकी रहमत और उसकी बरकतें हों।

Masdar:

सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम (सलाम करना सुन्नत-ए-मुअक्कदा है और इसका जवाब देना वाजिब है)।


2. हाथ मिलाते वक़्त की दुआ

जब दो मुसलमान आपस में सलाम करें और हाथ मिलाएँ (मसाफ़ा करें), तो यह दुआ पढ़ना सुन्नत से साबित है।

Arabic:

يَغْفِرُ اللهُ لَنَا وَلَكُمْ

तलफ़्फ़ुज़:

यग़्फ़िरुल-लाहु लना व लकुम

Roman (Hinglish):

Yaghfirul-lahu lana wa lakum

तर्जुमा:

अल्लाह हमारी और आपकी मफ़िरत (बख़्शिश) फ़रमाए।

Masdar:

सुनन अबी दाऊद (हदीस नंबर 5215) और तिर्मिज़ी। हदीस में आता है कि जब दो मुसलमान मिलते हैं और हाथ मिलाते हैं, तो उनके अलग होने से पहले ही अल्लाह उनकी मफ़िरत फ़रमा देता है।


Salam Aur Dua Mein Farq

अक्सर लोग सलाम और दुआ को एक ही चीज़ समझ लेते हैं, लेकिन इनके अदब और मक़सद में थोड़ा फ़र्क है जिसे समझना ज़रूरी है:

  • सलाम: यह एक इस्लामी शिष्टाचार (आदाब) है जो हर मुलाक़ात की शुरुआत में ज़रूरी है। यह अपने आप में एक मुकम्मल दुआ है, लेकिन इसका दर्जा एक ‘दीनी पहचान’ और ‘तहिया’ (Greeting) का है।
  • दुआ: सलाम के बाद जब हम एक-दूसरे का हाल पूछते हैं या हाथ मिलाते हुए “यग़्फ़िरुल-लाहु लना व लकुम” कहते हैं, तो वह इज़ाफ़ी (Extra) दुआ होती है। यह ज़रूरी या वाजिब नहीं है, लेकिन सुन्नत पर अमल करने के इरादे से कहना बहुत बेहतर है।

सलाम का जवाब देना वाजिब है, जबकि हाथ मिलाते वक़्त की दुआ मुस्तहब (पसंदीदा) है।


Rozmarrah Zindagi Mein Is Sunnat Ka Asar

जब हम सुन्नत के मुताबिक़ मिलते हैं, तो हमारी ज़िंदगी पर इसके गहरे असर पड़ते हैं:

  • मुहब्बत में इज़ाफ़ा: दिल की दूरियाँ ख़त्म होती हैं और भाईचारे का जज़्बा पैदा होता है।
  • इज़्ज़त: जब हम अदब से सलाम करते हैं, तो सामने वाले के दिल में हमारे लिए इज़्ज़त बढ़ती है।
  • रिश्तों की मज़बूती: चाहे दोस्त हों या रिश्तेदार, सुन्नत के मुताबिक़ मिलना ताल्लुक़ात में अल्लाह की रहमत शामिल कर देता है।
  • सादगी: इसमें कोई दिखावा नहीं है, बस सादे अल्फ़ाज़ और नेक नीयत है जो हर मुसलमान आसानी से अपना सकता है।

मुख़्तसर सवाल-जवाब

सवाल 1: क्या सिर्फ “अस्सलाम वालेकुम” कहना काफ़ी है?
जवाब: जी हाँ, मुलाक़ात की शुरुआत के लिए सिर्फ “अस्सलाम वालेकुम” कहना भी सुन्नत को पूरा करता है। हालांकि, “व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू” जोड़ने से ज़्यादा सवाब मिलता है।

सवाल 2: क्या मिलते वक़्त हाथ मिलाना सुन्नत है?
जवाब: जी हाँ, सलाम के साथ मुसाफ़ा (हाथ मिलाना) सुन्नत है। हदीस के मुताबिक़ इससे दो मुसलमानों के गुनाह झड़ जाते हैं। ध्यान रहे कि यह सिर्फ अपने ही जेंडर (मर्दों का मर्दों से और औरतों का औरतों से) या मेहरम के साथ होना चाहिए।


आख़िरी बात

इस्लाम में किसी मुसलमान से मिलना सिर्फ एक दुनियावी काम नहीं है, बल्कि यह नेकी कमाने का एक बेहतरीन मौक़ा है। हमें अपनी मुलाक़ातों को मुश्किल नहीं बनाना चाहिए। सुन्नत की सादगी में ही असल सुकून है। जब भी किसी भाई या बहन से मिलें, तो चेहरे पर मुस्कुराहट रखें, साफ़ दिल से सलाम करें और सुन्नत दुआ के ज़रिए अल्लाह की रहमत समेटें।

अल्लाह हमें सुन्नत के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।