मग़रिब की नमाज़ का वक़्त एक बहुत ही खास और पुर-सुकून वक़्त होता है। यह वह घड़ी होती है जब दिन ढल रहा होता है और रात का आग़ाज़ होता है। एक मुसलमान के लिए यह सिर्फ एक नमाज़ का वक़्त नहीं, बल्कि अपने पूरे दिन की मसरूफ़ियत को अल्लाह के सुपुर्द करने और रात की इबादतों के लिए ज़हन तैयार करने का ज़रिया है।
अक्सर लोग सवाल करते हैं कि Maghrib ki namaz ke baad ki dua कौन सी है या इस वक़्त क्या पढ़ना सुन्नत से साबित है? इस लेख में हम इसी सादगी और सुन्नत के मुताबिक़ जानकारी हासिल करेंगे।
Maghrib Ke Baad Ka Waqt Kaisa Hota Hai
मग़रिब की अज़ान के साथ ही दिन के उजाले का इख़्तिताम होता है। यह वक़्त इंसान की ज़िंदगी में एक ठहराव लेकर आता है। दफ़्तर से घर वापसी, बाज़ारों की रौनक और घर में शाम की हलचल के बीच जब एक मोमिन मस्जिद या घर के मुसल्ले पर मग़रिब की नमाज़ अदा करता है, तो उसे एक रूहानी सुकून मिलता है।
दिन भर की थकन के बाद यह वक़्त अल्लाह की याद में गुज़ारना दिल को इत्मीनान देता है। मग़रिब के बाद का वक़्त ज़िक्र और दुआ के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यह शाम के अज़कार (Evening Adhkar) का हिस्सा भी बन जाता है। यहाँ किसी दिखावे या लंबी कहानियों के बजाय सिर्फ अल्लाह की रहमत और हिदायत की तलब होती है।
Maghrib Ki Namaz Ke Baad Padhi Ja Sakti Hain Yeh Duas
मग़रिब की नमाज़ के बाद वैसे तो तमाम आम अज़कार पढ़े जा सकते हैं जो हर नमाज़ के बाद पढ़े जाते हैं, लेकिन कुछ ख़ास दुआएं और ज़िक्र सुन्नत की रोशनी में काफ़ी अहमियत रखते हैं। यहाँ हम 2 ऐसी दुआओं का ज़िक्र कर रहे हैं जो मग़रिब के बाद पढ़ना मसनून है।
1. जहन्नुम से हिफ़ाज़त की दुआ
यह दुआ मग़रिब और फ़ज्र की नमाज़ के बाद 7 बार पढ़ना सुन्नत से साबित है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ أَجِرْنِي مِنَ النَّارِ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा अजिरनी मिनन-नार
Roman (Hinglish)
Allahumma ajirni minan-nar
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! मुझे आग (जहन्नुम) से पनाह दे।”
Masdar (मस्दर)
यह दुआ सुनन अबू दाऊद (हदीस नंबर: 5079) में मौजूद है। इसमें बताया गया है कि जो शख़्स मग़रिब के बाद किसी से बात किए बिना इसे 7 बार पढ़ ले और उसी रात उसकी मौत हो जाए, तो उसके लिए जहन्नुम से नजात लिख दी जाती है।
2. तौहीद और बड़ाई का ज़िक्र
यह ज़िक्र मग़रिब की नमाज़ के बाद 10 बार पढ़ना बहुत अफ़ज़ल है।
Arabic Dua
لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، يُحْيِي وَيُمِيتُ، وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
तलफ़्फ़ुज़
ला इला-ह इल्लल्लाहु वह्दहू ला शरी-क लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, युह्यी व युमीतु, व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।
Roman (Hinglish)
La ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, lahul mulku wa lahul hamdu, yuhyi wa yumitu, wa huwa ‘ala kulli shay-in qadir.
तर्जुमा
“अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं, उसी की बादशाही है और उसी के लिए तमाम तारीफ़ें हैं, वही ज़िंदगी देता है और वही मौत देता है, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।”
Masdar (मस्दर)
यह ज़िक्र सुनन तिर्मिज़ी (हदीस नंबर: 3534) और मुसनद अहमद में नक़ल किया गया है। सुन्नत के मुताबिक़ इसे मग़रिब और फ़ज्र की नमाज़ के बाद हाथ-पाँव (नमाज़ की हालत) बदले बिना 10 मर्तबा पढ़ना बेहतर है।
Kya Maghrib Ke Baad Apni Zuban Mein Dua Kar Sakte Hain?
जी हाँ, बिल्कुल। अरबी दुआओं और सुन्नत अज़कार के बाद आप अपनी ज़ुबान (चाहे वो हिंदी हो, उर्दू हो या कोई और) में अल्लाह से अपनी ज़रूरतें मांग सकते हैं। इस्लाम में दुआ सिर्फ अरबी तक महदूद नहीं है।
अल्लाह दिलों के हाल जानता है। मग़रिब के बाद जब आप इत्मीनान से बैठें, तो अपनी और अपने घर वालों की सेहत, रिज़्क़ में बरकत और गुनाहों की माफ़ी के लिए दुआ करें। दुआ का अदब यह है कि:
- अल्लाह की हम्द (तारीफ़) करें।
- नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर दरूद भेजें।
- फिर आज़िज़ी के साथ अपनी हाजतें पेश करें।
Rozana Shaam Ke Waqt Dua Ki Aadat
मग़रिब की नमाज़ के बाद दुआ करना सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि एक आदत होनी चाहिए। जब हम रोज़ाना पाबंदी से सुन्नत अज़कार करते हैं, तो हमारे दिल में अल्लाह पर भरोसा (तवक्कुल) बढ़ता है।
दिन भर की भाग-दौड़ के बाद जब हम मग़रिब के मुसल्ले पर बैठकर अल्लाह को याद करते हैं, तो यह हमारे ईमान को ताज़गी देता है। कोशिश करें कि नमाज़ के फ़ौरन बाद उठने के बजाय कम से कम 5-10 मिनट ज़िक्र और दुआ में गुज़ारें। यह चंद लम्हे आपकी आने वाली रात को पुर-सुकून बनाने के लिए काफ़ी हैं।
Short Q&A
1. क्या मग़रिब के बाद हाथ उठा कर दुआ करना सुन्नत है?
नमाज़ के फ़ौरन बाद के अज़कार (जैसे सुब्हानअल्लाह, अल्हम्दुलिल्लाह) के बाद इन्फ़िरादी (अकेले) तौर पर हाथ उठाकर दुआ करना जायज़ और पसंद किया गया अमल है, लेकिन इसे फ़र्ज़ या वाजिब न समझा जाए।
2. क्या मग़रिब के बाद कोई खास तस्बीह लाज़मी है?
कोई भी तस्बीह लाज़मी या फ़र्ज़ नहीं है। जो अज़कार ऊपर बताए गए हैं, वे सुन्नत से साबित हैं और इनका पढ़ना बहुत ज़्यादा बरकत का सबब है। सबसे बेहतर वही है जो नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सिखाया।
आख़िरी बात
मग़रिब की नमाज़ के बाद की दुआ और ज़िक्र हमें अल्लाह के करीब लाते हैं। दीन में सादगी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है। हमें किसी बड़े दावे या ग़ैर-ज़रूरी तरीक़ों में पड़ने के बजाय साहिह हदीस से साबित छोटी और पुर-असर दुआओं पर ध्यान देना चाहिए। अल्लाह हम सबको सुन्नत के मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारने और अपने ज़िक्र की तौफ़ीक़ अता फरमाए।


