Maidan-e-Arafat Ki Dua | अरफ़ात के मैदान में पढ़ी जाने वाली दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

मैदान-ए-अरफ़ात की दुआ

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
तलफ़्फ़ुज़:
ला इला-ह इल्लल्लाहु वह-दहू ला शरी-क लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।
तर्जुमा:
अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। बादशाहत उसी की है और तमाम तारीफ़ें उसी के लिए हैं, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।
मसदर: 
सुनन तिरमिज़ी (हदीस: 3585)
maidan e arafat ki dua main

Table of Content

अरफ़ात का लम्हा

हज के सफ़र में अरफ़ात का मैदान वह मुक़ाम है जहाँ वक़्त ठहर सा जाता है। यह सिर्फ़ एक जगह नहीं, बल्कि बंदे और उसके रब के दरमियान एक अज़ीम मुलाक़ात का ज़रिया है। 9 ज़िल-हिज्जा का सूरज जब ढलने की तरफ़ बढ़ता है, तो आसमान से अल्लाह की रहमतें ज़मीन के इस टुकड़े पर ख़ास तौर से उतरती हैं। इस घड़ी में हर हाजी अपने गुनाहों का बोझ लेकर खड़ा होता है और अल्लाह की बे-पनाह मग़फ़िरत की उम्मीद करता है। यह वह लम्हा है जहाँ इंसान अपनी तमाम दुनियावी हैसियत भूलकर सिर्फ़ एक सवाल करने वाला बनकर अल्लाह के सामने हाज़िर होता है।

अरफ़ाह और दुआ का रिश्ता

अरफ़ाह का दिन असल में दुआ का दिन है। हदीस-ए-मुबारका में आता है कि बेहतरीन दुआ वह है जो अरफ़ाह के दिन की जाए। इस मैदान में दुआ करना सिर्फ़ अल्फ़ाज़ को दोहराना नहीं है, बल्कि यह अपने दिल को अल्लाह के हवाले कर देने का नाम है। यहाँ बंदगी का सबसे ऊँचा मकाम यह है कि इंसान अपनी कमज़ोरी को माने और अल्लाह की बड़ाई का इक़रार करे। अरफ़ात की रूह तवाज़ु (आजिज़ी) में छुपी है; जितनी ज़्यादा आजिज़ी होगी, दिल उतना ही अल्लाह के क़रीब महसूस करेगा। यह दिन हमें सिखाता है कि अल्लाह की रहमत उसकी पकड़ से कहीं बड़ी है।


Maidan-e-Arafat Mein Padhi Jane Wali Masnoon Dua

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस अज़ीम दिन के लिए एक ख़ास दुआ का ज़िक्र फ़रमाया है। यह दुआ अल्लाह की वाहदानियत (एक होने) और उसकी कुदरत का सबसे बड़ा इक़रार है।

Arabic Dua

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ، وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ

तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)

ला इला-ह इल्लल्लाहु वह-दहू ला शरी-क लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु, व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर।

Roman (Hinglish)

La ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, lahul-mulku wa lahul-hamdu, wa huwa ‘ala kulli shay’in qadir.

तर्जुमा

“अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। बादशाहत उसी की है और तमाम तारीफ़ें उसी के लिए हैं, और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।”

म़सदर (Source)

यह दुआ सुनन तिरमिज़ी (हदीस: 3585) में नक़ल की गई है। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि यह वह दुआ है जो मैंने और मुझसे पहले के नबियों ने अरफ़ाह के दिन पढ़ी।


दुआ और दिल की हालत

Maidan-e-Arafat ki dua की ताक़त सिर्फ़ उसके अल्फ़ाज़ में नहीं, बल्कि पढ़ने वाले के दिल की हालत में है। जब एक इंसान सूरज के ढलने तक क़िब्ला रुख़ खड़ा होकर, अपने हाथ फैलाकर इस दुआ को पढ़ता है, तो उसे यह एहसास होना चाहिए कि अल्लाह ही सब कुछ देने वाला है।

  1. ख़ामोशी और सुकून: अरफ़ात में शोर-ओ-ग़ुल के बजाए ख़ामोशी और दिल की गहराइयों से की जाने वाली पुकार ज़्यादा असर रखती है।
  2. तवाज़ु (आजिज़ी): अपने सर को झुकाकर और अपनी ग़लतियों को याद करके जब हम अल्लाह की बड़ाई बयान करते हैं, तो दुआ में एक रूहानी ताक़त पैदा होती है।
  3. अल्लाह पर भरोसा: दुआ करते वक़्त यह यक़ीन रखें कि अल्लाह अपने बंदे को ख़ाली हाथ लौटाना पसंद नहीं फ़रमाता। रहमत की उम्मीद ही अरफ़ात का असल नूर है।

दो मुख़्तसर सवाल

1. क्या अरफ़ात में सिर्फ़ यही दुआ पढ़ी जाती है?

अरफ़ात के मैदान में ज़िक्र की गई यह दुआ सबसे अफ़ज़ल है क्योंकि यह सुन्नत से साबित है। हालाँकि, इस मसनून दुआ के साथ-साथ आप अपनी ज़बान में अपनी मग़फ़िरत, अहल-ओ-अयाल (परिवार) की ख़ैरियत और उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए कोई भी जायज़ दुआ कर सकते हैं।

2. अगर लफ़्ज़ याद न हों, तो क्या अपने दिल से दुआ की जा सकती है?

जी हाँ, अल्लाह दिलों के हाल और नीयत को जानता है। अगर किसी को अरबी अल्फ़ाज़ याद न हों, तो वह अपनी मादरी ज़बान में अल्लाह से रो-रोकर गिरगिड़ा सकता है। अहम बात अल्फ़ाज़ का सही होना नहीं, बल्कि दिल का अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जो होना है।


आख़िरी बात

मैदान-ए-अरफ़ात वह मुक़ाम है जहाँ ज़मीन और आसमान के दरमियान के फ़ासले मिटते हुए महसूस होते हैं। यहाँ पहुँचने वाला हर हाजी अल्लाह का मेहमान होता है। Maidan-e-Arafat ki dua हमें यह पैग़ाम देती है कि पूरी कायनात का मालिक सिर्फ़ अल्लाह है और हमें अपनी हर ज़रूरत के लिए उसी की तरफ़ रुजू करना चाहिए। जब सूरज अरफ़ात की पहाड़ियों के पीछे छुपता है, तो बंदा इस उम्मीद के साथ मुज़दलिफ़ा की तरफ़ कूच करता है कि उसका रब उसकी पुकार सुन चुका है और उसकी रहमत ने उसे अपनी आगोश में ले लिया है।

अल्लाह तआला तमाम हज्ज करने वालों की हाज़िरी क़बूल फ़रमाए और हमें अरफ़ात की रूह को समझने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।