इंसान एक सामाजिक जीव है। हम अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में कई लोगों से मिलते हैं, बैठते हैं और बातचीत करते हैं। चाहे वह दफ़्तर की कोई मीटिंग हो, दोस्तों के साथ चाय की नशिस्त (baithak) हो या परिवार के साथ गुज़ारा गया वक़्त—इन तमाम मौक़ों को ‘मजलिस’ कहा जाता है।
अल्लाह तआला ने इंसान को बोलने की सलाहियत दी है, लेकिन कई बार बातचीत के दौरान हमसे अनजाने में कुछ ऐसी बातें निकल जाती हैं जो शायद नहीं कहनी चाहिए थीं। यहीं पर सुन्नत हमें एक बेहद खूबसूरत और आसान रास्ता दिखाती है। Majlis se uthne ki dua दरअसल हमारी बातचीत को मुकम्मल करने और उसमें रह गई कमियों की मग़फ़िरत (माफ़ी) मांगने का एक ज़रिया है।
Majlis Aur Insaan Ki Zubaan
जब हम किसी महफ़िल या बैठक में बैठते हैं, तो गुफ़्तगू का सिलसिला लंबा हो सकता है। इंसान होने के नाते यह मुमकिन है कि हमारी ज़ुबान से कोई ऐसी बात निकल जाए जो बेमक़सद हो या जिसमें कोई छोटी-मोटी ग़लती हो जाए। इस्लाम हमें यह सिखाता है कि हम अपनी ज़ुबान की हिफ़ाज़त करें, लेकिन साथ ही वह हमारी कमज़ोरियों को भी समझता है।
मजलिस से उठते वक़्त दुआ पढ़ना हमें इस बात का एहसास दिलाता है कि हमारी हर बात अल्लाह के इल्म में है। यह दुआ एक याददिहानी (reminder) की तरह काम करती है कि महफ़िल ख़त्म होने के बाद हम वापस अपने असल मक़सद और अल्लाह की याद की तरफ़ लौटें। इसमें कोई डर या बोझ नहीं है, बल्कि यह एक दिली सुकून का ज़रिया है कि हमने अपनी मजलिस का इख़्तिताम (अंत) अल्लाह की बड़ाई बयान करते हुए किया है।
Islam Majlis Ke Adab Ko Kaise Dekhta Hai
इस्लाम में मजलिस के आदाब को बहुत अहमियत दी गई है। यह सिर्फ़ बैठने या उठने के तरीक़े नहीं हैं, बल्कि यह हमारी शख़्सियत और अख़्लाक़ का हिस्सा हैं। ज़ुबान की ज़िम्मेदारी का मतलब यह नहीं कि हम बातचीत करना छोड़ दें, बल्कि इसका मतलब है कि हम अपनी बातों में नरमी और सच्चाई रखें।
अल्लाह के रसूल ﷺ ने मजलिस से उठते वक़्त एक दुआ सिखाई है, जिसे ‘कफ़्फ़ारा-ए-मजलिस’ (मजलिस का बदला या सफ़ाई) भी कहा जाता है। यह दुआ इस बात की अलामत है कि अगर बातचीत के दौरान हमसे कोई लफ़्ज़ी चूक हुई है, तो अल्लाह की रहमत उसे माफ़ फ़रमा दे। यह अमल हमें होशियार और बा-अदब बनाता है, ताकि हम अगली बार और भी बेहतर अंदाज़ में दूसरों से मिल सकें।
Majlis Se Uthte Waqt Padhi Jane Wali Masnoon Dua
यह दुआ बहुत ही मुख़्तसर (छोटी) है लेकिन इसके मानी बहुत गहरे हैं। इसे पढ़ना सुन्नत से साबित है और हर मुसलमान को इसे याद कर लेना चाहिए।
Arabic Dua
سُبْحَانَكَ اللَّهُمَّ وَبِحَمْدِكَ، أَشْهَدُ أَنْ لاَ إِلَهَ إِلاَّ أَنْتَ، أَسْتَغْفِرُكَ وَأَتُوبُ إِلَيْكَ
तलफ़्फ़ुज़
सुब्-हान-कल्ला-हुम्मा व बि-हम्-दि-क, अश्-हदु अल-ला इला-ह इल्ल-अन्-त, अस्-तग्फ़ि-रु-क व अ-तूबु इ-लै-क।
Roman (Hinglish)
Subhanak-Allahumma wa bihamdika, ashhadu alla ilaha illa Anta, astaghfiruka wa atubu ilaik.
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! तू अपनी तमाम खूबियों के साथ पाक है। मैं गवाही देता हूँ कि तेरे सिवा कोई माबूद (इबादत के लायक) नहीं। मैं तुझसे मग़फ़िरत (माफ़ी) चाहता हूँ और तेरी तरफ़ तौबा करता हूँ।”
Masdar (Hadith Reference)
यह दुआ जामी अत-तिर्मिज़ी (Jami` at-Tirmidhi) की हदीस नंबर 3433 में ज़िक्र की गई है। साथ ही इसे सुनन अबू दाऊद और नसाई में भी रिवायत किया गया है। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स किसी मजलिस में बैठे और उसमें (अनजाने में) कुछ ग़लत बातें हो जाएँ, और वह उठने से पहले यह दुआ पढ़ ले, तो उसकी उस मजलिस की कोताहियां माफ़ कर दी जाती हैं।
Is Dua Ka Maqsad Kya Hai
इस दुआ को पढ़ने के पीछे का मक़सद महज़ शब्दों को दोहराना नहीं है, बल्कि यह एक ज़हनी और रूहानी (spiritual) सफ़ाई का अमल है।
- ख़ुद को याद दिलाना: यह दुआ हमें याद दिलाती है कि हमारी हर मजलिस का मरकज़ अल्लाह की जात होनी चाहिए।
- अदब और एहतियात: जब हम यह दुआ पढ़ते हैं, तो हमें अपनी ज़ुबान पर एहतियात रखने की आदत पड़ती है। हमें महसूस होता है कि बातें महज़ हवा में नहीं उड़ जातीं, उनकी अहमियत होती है।
- अल्लाह पर भरोसा: यह दुआ हमारे अंदर उम्मीद पैदा करती है। यह बताती है कि अल्लाह बहुत रहीम है और वह हमारी छोटी-छोटी मानवीय कमज़ोरियों को महज़ एक दुआ की बदौलत माफ़ फ़रमा देता है।
यह दुआ हमें एक ज़िम्मेदार इंसान बनाती है जो अपनी बातचीत के बाद अल्लाह की तरफ़ पलटता है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या हर मजलिस के बाद यह दुआ पढ़नी चाहिए?
जी हाँ, सुन्नत के मुताबिक़ चाहे मजलिस दीनी हो या दुनियावी, हर उस बैठक के बाद जहाँ कुछ लोग जमा हुए हों, यह दुआ पढ़ना मुस्तहब (बेहतर) है। यह मजलिस को मुकम्मल और बाबरकत बनाता है।
क्या छोटी बैठक या फ़ोन पर बातचीत के बाद भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?
बिल्कुल, अगर आप दो लोग भी बैठे हैं या किसी से लंबी बातचीत हुई है, तो आप इसे पढ़ सकते हैं। सुन्नत का दायरा बहुत वसी (बड़ा) है और यह हर उस जगह मुफ़िद है जहाँ ज़ुबान का इस्तेमाल हुआ हो।
आख़िरी बात
मजलिस से उठने की दुआ एक तोहफ़ा है जो हमें अपनी बातचीत को पाकीज़ा बनाने का मौक़ा देता है। यह सुन्नत हमें सिखाती है कि हम अपनी महफ़िलों को सिर्फ़ हँसी-मज़ाक या दुनियावी बातों तक महदूद न रखें, बल्कि अंत में अपने रब को याद करें। इससे न सिर्फ़ दिल को सुकून मिलता है, बल्कि हमारी गुफ़्तगू में एक अदब और संजीदगी पैदा होती है। सुन्नत से मोहब्बत का मतलब ही यही है कि हम अपनी ज़िंदगी के छोटे-छोटे कामों में नबी ﷺ के बताए हुए आसान और खूबसूरत तरीक़ों को शामिल करें।


