Quick Summary
Dua Name
Masjid Mein Dakhil Hone Aur Nikalne Ki Dua
Arabic Text
اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ
Hindi Transliteration
अल्लाहुम्मा-फ़्तह ली अबवाबा रहमतिका
English Transliteration
Allahumma-ftah li abawaba rahamatika
Source
Sahih Muslim, Hadith: 713
ज़मीन पर अल्लाह को सबसे ज़्यादा महबूब (पसंदीदा) जगहें मस्जिदें हैं। जब हम दुनिया में किसी ख़ास इंसान या बड़े अफ़सर के घर जाते हैं, तो वहां के कायदे-क़ानून और अदब का पूरा ख़्याल रखते हैं। ज़रा सोचिए, जब हम तमाम जहानों के मालिक (अल्लाह) के घर में हाज़िरी देने जाएं, तो वहां का अदब कैसा होना चाहिए?
नबी-ए-करीम (ﷺ) ने हमें अल्लाह के घर में आने और वहां से जाने के बेहद ख़ूबसूरत आदाब और दुआएं सिखाई हैं। इन सुन्नतों पर अमल करने से न सिर्फ़ हमारी नमाज़ों में नूर पैदा होता है, बल्कि मस्जिद में बिताया गया हर एक पल इबादत में शुमार होता है।
अगर आप Masjid mein dakhil hone ki dua और वहां से वापसी यानी Masjid se nikalne ki dua को सही तलफ़्फ़ुज़ (उच्चारण) के साथ याद करना चाहते हैं, तो यह गाइड ख़ास तौर पर आपके लिए तैयार की गई है।
1. Masjid Mein Dakhil Hone Ki Dua (मस्जिद में जाने की दुआ)
मस्जिद अल्लाह के रहमत का दरवाज़ा है। जब आप नमाज़ के लिए मस्जिद की चौखट पर पहुँचें, तो सबसे पहले थोड़ा रुकें, अपने नबी (ﷺ) पर दुरूद भेजें और अपना दायाँ (Right) पैर मस्जिद के अंदर रखते हुए यह मसनून दुआ पढ़ें:
अरबी (Arabic):
اللَّهُمَّ افْتَحْ لِي أَبْوَابَ رَحْمَتِكَ
रोमन इंग्लिश (Transliteration):
Allahumma-f-tah li abwaba rahmatik.
हिंदी तर्जुमा (Hindi Translation):
“ऐ अल्लाह! मेरे लिए अपनी रहमत के दरवाज़े खोल दे।”
दाख़िल होने की ख़ास सुन्नतें:
- मस्जिद की तरफ़ जाते वक़्त दौड़ कर या जल्दबाज़ी में न चलें, बल्कि पूरे सुकून और वक़ार के साथ क़दम बढ़ाएं।
- अंदर जाते ही अगर जमात खड़ी होने में वक़्त हो, तो बैठने से पहले 2 रकअत ‘तहीयतुल मस्जिद’ (नफ़्ल नमाज़) ज़रूर पढ़ें।
2. Masjid Se Nikalne Ki Dua (मस्जिद से बाहर आने की दुआ)
जिस तरह मस्जिद में जाते वक़्त हम अल्लाह की रहमत मांगते हैं, उसी तरह बाहर आते वक़्त हम अल्लाह से उसका फ़ज़्ल (यानी हलाल रोज़ी और दुनियावी भलाई) मांगते हैं।
जब आप नमाज़ मुकम्मल करके मस्जिद से बाहर आने लगें, तो अपना बायाँ (Left) पैर दरवाज़े से बाहर निकालें और यह दुआ पढ़ें:
अरबी (Arabic):
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ مِنْ فَضْلِكَ
रोमन इंग्लिश (Transliteration):
Allahumma inni as-aluka min fadlik.
हिंदी तर्जुमा (Hindi Translation):
“ऐ अल्लाह! बेशक मैं तुझसे तेरा फ़ज़्ल (करम और भलाई) मांगता हूँ।”
3. मस्जिद के 5 ज़रूरी आदाब (Etiquettes of Mosque)
दुआओं के साथ-साथ अगर हम इन 5 आदाब का ख़्याल रखेंगे, तो हमारी मस्जिदें और भी ज़्यादा रूहानी और पुर-सुकून बन जाएंगी:
- पाकीज़गी और ख़ुशबू: मस्जिद में हमेशा साफ़-सुथरे कपड़े पहन कर आएं। लहसुन, कच्चा प्याज़ या कोई भी बदबूदार चीज़ खाकर मस्जिद में आना सख़्त मना है। मुमकिन हो तो इत्र (ख़ुशबू) लगाकर आएं।
- मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल: मस्जिद में अपने फ़ोन को हमेशा ‘Silent’ मोड पर रखें। नमाज़ के दौरान किसी के फ़ोन की रिंगटोन बजने से सैकड़ों नमाज़ियों का ध्यान भटकता है।
- दुनियावी बातें न करना: मस्जिद अल्लाह के ज़िक्र के लिए बनाई गई है। यहाँ बैठकर दुनिया की बातें करना, हँसना, या ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त (Business) की बातें करना जायज़ नहीं है।
- सफ़ (Line) सीधी करना: जमात में खड़े होते वक़्त सफ़ों को सीधा रखें और कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों, बीच में खाली जगह न छोड़ें।
- नमाज़ी के सामने से न गुज़रना: अगर कोई शख़्स मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहा हो, तो उसके सजदे की जगह के बिल्कुल सामने से गुज़रना बहुत बड़ा गुनाह है। अगर निकलना ज़रूरी हो, तो किसी आड़ (सुतरा) का इस्तेमाल करें या थोड़ा दूर से गुज़रें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQs)
सवाल: क्या मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त कोई और दुआ भी पढ़ सकते हैं?
जवाब: जी हाँ, हदीस से साबित है कि मस्जिद में दाख़िल होते वक़्त पहले “बिस्मिल्लाहि वस्सलातु वस्सलामू अला रसूलिल्लाह” (अल्लाह के नाम से, और अल्लाह के रसूल पर दुरूद-ओ-सलाम हो) पढ़ना चाहिए, और उसके बाद Masjid mein dakhil hone ki dua पढ़नी चाहिए।
सवाल: अगर मस्जिद में जाते वक़्त ग़लती से बायाँ (Left) पैर पहले रख दिया तो क्या करें?
जवाब: अगर अनजाने में ऐसा हो जाए तो कोई गुनाह नहीं है, आपका दाख़िला सही है। लेकिन सुन्नत पर अमल करने का बहुत बड़ा सवाब है, इसलिए हमेशा सीधे पैर का ही ख़्याल रखने की कोशिश करें।
सवाल: क्या औरतें भी यही दुआ पढ़ेंगी?
जवाब: बिल्कुल, औरतों के लिए भी मस्जिद में दाख़िल होने और बाहर निकलने की दुआएं और आदाब बिल्कुल वही हैं जो मर्दों के लिए हैं (अगर वे किसी मस्जिद या दरगाह के तयशुदा हिस्से में इबादत के लिए जा रही हैं)।
अल्लाह ताला हम सबको अपनी मस्जिदों को आबाद करने, नमाज़ों की पाबंदी करने और सुन्नतों पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।



