निकाह इस्लाम में एक पाकीज़ा बंधन है, जो न सिर्फ दो इंसानों को बल्कि दो परिवारों को अल्लाह की रज़ा के लिए जोड़ता है। जब निकाह की मजलिस मुकम्मल होती है, तो सुन्नत तरीका यह है कि नए जोड़े के लिए अल्लाह से बरकत और रहमत की दुआ की जाए। अक्सर लोग निकाह के बाद कई तरह की रस्मों में उलझ जाते हैं, लेकिन सबसे अहम चीज़ वह मसनून दुआ है जो अल्लाह के रसूल ﷺ ने हमें सिखाई है।
Nikah Ke Baad Islam Kya Sikhata Hai
इस्लाम में निकाह महज़ एक कानूनी मुआहिदा (Agreement) नहीं बल्कि एक इबादत है। जब कोई बंदा निकाह करता है, तो उसका आधा दीन मुकम्मल हो जाता है। निकाह के फ़ौरन बाद इस्लाम हमें सादगी और दुआ की तरफ ले जाता है।
अल्लाह की तरफ से बरकत पाना ही निकाह की असल कामयाबी है। निकाह के बाद जो दुआ पढ़ी जाती है, उसका मक़सद मियां-बीवी के दरमियान मोहब्बत पैदा करना और उनके आने वाली ज़िंदगी में खैर व बरकत की गुज़ारिश करना है। सुन्नत का तरीका हमें सिखाता है कि हम दिखावे और रस्मों के बजाय अल्लाह की ज़ात पर भरोसा करें और मसनून दुआओं के ज़रिए अपनी नई ज़िंदगी का आग़ाज़ करें।
Nikah Ke Baad Padhi Jaane Wali Masnoon Dua
निकाह मुकम्मल होने के बाद नए जोड़े (दूल्हा और दुल्हन) को मुबारकबाद देने और उनके लिए दुआ करने का एक खास तरीका हदीस में मिलता है। यह दुआ बेहद जामे (Complete) है और इसमें जोड़े के लिए दुनिया और आख़िरत की भलाई छुपी है।
Arabic Dua
بَارَكَ اللَّهُ لَكَ، وَبَارَكَ عَلَيْكَ، وَجَمَعَ بَيْنَكُمَا فِي خَيْرٍ
तलफ़्फ़ुज़
बारकल्लाहु लका, व बारका अलैका, व जमाअ़ बैनकुमा फ़ी खैर।
Roman (Hinglish)
Baarakallahu laka, wa baaraka ‘alaika, wa jama’a bainakuma fee khair.
तर्जुमा
“अल्लाह तुम्हें बरकत दे, और तुम पर अपनी बरकतें नाज़िल फरमाए, और तुम दोनों को खैर व भलाई के साथ (एक साथ) जोड़े रखे।”
Masdar
यह दुआ सुनन अबू दाऊद (हदीस नंबर: 2130) और जामिअ तिर्मिज़ी (हदीस नंबर: 1091) में मौजूद है। हज़रत अबू हुरैरा (रज़िअल्लाहु अन्हु) रिवायत करते हैं कि जब नबी करीम ﷺ किसी शख्स को निकाह की मुबारकबाद देते, तो यही दुआ फरमाते थे।
Kya Nikah Ke Baad Haath Utha Kar Dua Karna Zaroori Hai
भारतीय समाज में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या निकाह के बाद हाथ उठाकर इज्तिमाई (Collective) दुआ करना लाज़मी है?
इस्लामी तालीमात के मुताबिक, निकाह के बाद हाथ उठाकर दुआ करना जाइज़ है। अगर निकाह पढ़ाने वाले आलिम या कोई और शख्स हाथ उठाकर दुआ करता है और बाकी लोग ‘आमीन’ कहते हैं, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन इसे निकाह के रुक्न (हिस्सा) की तरह लाज़मी या फर्ज़ समझना सही नहीं है।
सुन्नत का असल अदब यह है कि दिल से और इख्लास के साथ दुआ की जाए। अगर कभी सादगी की वजह से हाथ उठाकर दुआ न भी हो सके, तब भी निकाह की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
Nikah Aur Barakat Ka Taluq
अक्सर लोग समझते हैं कि निकाह के बाद बहुत सारी रस्में करने से घर में खुशहाली आएगी, लेकिन इस्लाम हमें बताता है कि असली बरकत सुन्नत पर अमल करने में है।
- अख्लाक और सब्र: निकाह के बाद पति-पत्नी का एक-दूसरे के साथ अच्छा बर्ताव और सब्र ही घर में बरकत लाता है।
- अल्लाह पर भरोसा: नई ज़िंदगी की शुरुआत में अगर इंसान अल्लाह पर कामिल यकीन रखे और सुन्नत के मुताबिक अपनी ज़िंदगी ढाले, तो अल्लाह ताला उनके रिज़्क और खुशियों में इज़ाफ़ा फरमाता है।
- सादगी: निकाह जितना सादा होगा, उसमें उतनी ही ज़्यादा रहमत और बरकत शामिल होगी।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल: क्या दूल्हा-दुल्हन खुद भी अपने लिए यह दुआ पढ़ सकते हैं?
जवाब: जी हाँ, दूल्हा और दुल्हन खुद भी एक-दूसरे के लिए और अपनी नई ज़िंदगी के लिए यह दुआ पढ़ सकते हैं। इसके अलावा वह अल्लाह से अपनी ज़बान में भी खैर व बरकत की दुआ मांग सकते हैं।
सवाल: क्या निकाह के फ़ौरन बाद कोई खास रस्म करना सुन्नत है?
जवाब: निकाह के बाद किसी तरह की सांस्कृतिक रस्म (जैसे आईना देखना या कोई खेल) सुन्नत से साबित नहीं है। निकाह के बाद सबसे अहम और सुन्नत अमल ‘वलीमा’ है, जो अपनी हैसियत के मुताबिक निकाह के अगले दिन या उसके बाद किया जाता है।
Aakhiri Baat
निकाह ज़िंदगी का एक नया मोड़ है। इस मौके पर रस्मों-रिवाज के शोर में अक्सर हम उन मसनून दुआओं को भूल जाते हैं जो हमारे नबी ﷺ ने हमें सिखाई हैं। सुन्नत की रहनुमाई में ही हमारे लिए दोनों जहां की कामयाबी है। हमें चाहिए कि निकाह को सादा रखें, सुन्नत के मुताबिक दुआएं पढ़ें और अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखें। जब हम सुन्नत को अपनाते हैं, तो हमारी ज़िंदगी में सुकून और बरकत खुद-ब-खुद आ जाती है।


