ज़िंदगी के सफ़र में उतार-चढ़ाव आना एक फ़ितरी बात है। कभी हालात इतने साजगार नहीं होते कि इंसान अपनी ज़रूरतों को आसानी से पूरा कर सके। ऐसी सूरत में किसी से मदद लेना या क़र्ज़ लेना एक मजबूरी बन जाता है। इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो हमें ज़िंदगी के हर मोड़ पर रहनुमाई देता है, चाहे वह मामला इबादत का हो या लेन-देन का।
क़र्ज़ लेना या देना सिर्फ़ एक माली (financial) मामला नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी और अमानत है। जब एक इंसान मजबूरी में हाथ फैलाता है, तो उसके दिल की कैफ़ियत और नियत की पाकीज़गी बहुत मायने रखती है। इसी तरह, जो शख़्स अपना माल किसी को ज़रूरत के वक़्त देता है, उसका अमल भी अल्लाह के नज़दीक बड़ा मक़ाम रखता है।
Qarz Aur Insaan Ki Majboori
इंसानी ज़िंदगी में कभी ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ हाथ तंग हो जाता है। ऐसे वक़्त में क़र्ज़ लेना कोई गुनाह या शर्मिंदगी की बात नहीं है, बशर्ते वह सख़्त ज़रूरत के लिए हो। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपने भाई की मजबूरी को समझें।
मजबूरी के इन लम्हों में इंसान अक्सर ज़हनी दबाव (stress) का शिकार हो जाता है। उसे यह फ़िक्र सताती है कि अदायगी कैसे होगी और क्या वह इस अमानत को सही वक़्त पर लौटा पाएगा। यहाँ दुआ और नियत का मेल शुरू होता है। दुआ हमें वह रूहानी सुकून और हौसला देती है जिसकी ज़रूरत हमें मुश्किल वक़्त में होती है।
Islam Qarz Ko Kaise Dekhta Hai
इस्लाम में क़र्ज़ को एक अमानत के तौर पर देखा जाता है। इसमें सबसे अहम चीज़ ‘नियत’ (intention) है। अगर कोई शख़्स इस नियत के साथ क़र्ज़ लेता है कि वह उसे ईमानदारी से लौटाएगा, तो अल्लाह की तरफ़ से उसके लिए आसानी के रास्ते खुलते हैं।
क़र्ज़ के मामले में अदायगी का जज्बा होना बहुत ज़रूरी है। यह सिर्फ़ पैसे का लेन-देन नहीं है, बल्कि दो इंसानों के बीच के भरोसे का नाम है। सुन्नत का तरीक़ा यह है कि क़र्ज़ को बोझ समझकर नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी समझकर लिया जाए और अल्लाह से मदद माँगी जाए ताकि वह अदायगी की राह आसान कर दे।
Qarz Lene Aur Dene Ke Waqt Padhi Jane Wali Masnoon Dua
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमें मुतअल्लिक़ा हालात के लिए बेहतरीन दुआएं सिखाई हैं। ये दुआएं हमें अल्लाह पर भरोसा करना सिखाती हैं और दिल को इत्मीनान देती हैं।
1. क़र्ज़ की अदायगी और आसानी के लिए दुआ
जब कोई शख़्स क़र्ज़ के बोझ तले हो या उसे अदायगी की फ़िक्र हो, तो उसे यह मसनून दुआ पढ़नी चाहिए। हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मरवी है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने यह कलिमात सिखाए:
Arabic Dua
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मक-फ़िनी बि-हलालिका ‘अन हरामिका, व-अग्निनी बि-फ़ज़्लिका ‘अम्मन सिवाक।
Roman (Hinglish)
Allahummak-fini bi-halalika ‘an haramika, wa-aghnini bi-fadlika ‘amman siwak.
तर्जुमा
“ऐ अल्लाह! मुझे अपने हलाल (रिज़्क) के ज़रिए अपने हराम से बचा ले (यानी हलाल मेरे लिए काफ़ी कर दे) और अपने फ़ज़्ल से मुझे अपने सिवा दूसरों से बे-नियाज़ (ग़नी) कर दे।”
Masdar
(जामि’अ तिर्मिज़ी: 3563, हसन)
2. क़र्ज़ देने वाले के लिए दुआ (बरकत की दुआ)
जब कोई शख़्स अपना क़र्ज़ अदा करे, तो सुन्नत यह है कि वह क़र्ज़ देने वाले के लिए दुआ भी करे। यह एक बेहतरीन अख़लाक़ है जो आपसी रिश्तों में बरकत पैदा करता है।
Arabic Dua
بَارَكَ اللَّهُ لَكَ فِي أَهْلِكَ وَمَالِكَ
तलफ़्फ़ुज़
बारकल-लाहु लका फ़ी अहलिका व-मालिका।
Roman (Hinglish)
Baarakal-lahu laka fee ahlika wa-maalika.
तर्जुमा
“अल्लाह तुम्हारे अहल-ओ-अयाल (परिवार) और तुम्हारे माल में बरकत अता फरमाए।”
Masdar
(सुनन इब्न माजह: 2424, सहीह)
Dua Ke Saath Qarz Mein Aitidal
दुआ एक मोमिन का हथियार है, लेकिन इसके साथ-साथ अमली कोशिश और नेक नियत भी लाज़मी है। क़र्ज़ लेते वक़्त हमारे दिल में यह सच्चा इरादा होना चाहिए कि हम इसे लौटाएंगे। इस्लाम हमें सिखाता है कि हम अपनी चादर देखकर पैर फैलाएं, ताकि हमें ग़ैर-ज़रूरी क़र्ज़ की ज़रूरत न पड़े।
अमानतदारी और सच्चाई ऐसे सिफ़ात हैं जो एक मुसलमान की पहचान होनी चाहिए। जब हम दुआ करते हैं, तो हम अल्लाह से रास्ता मांगते हैं। बरकत का असल मफ़हूम यही है कि कम माल में भी इंसान की ज़रूरतें पूरी हो जाएं और वह लोगों के एहसान तले दबने से बच जाए। अल्लाह पर कामिल भरोसा (तवक्कुल) ही वह चीज़ है जो मुश्किल को आसानी में बदल सकती है।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
सवाल: क्या क़र्ज़ लेने से पहले दुआ करना सुन्नत रवैया है?
जवाब: जी हाँ, किसी भी ज़रूरत के लिए अल्लाह की तरफ़ रुजू करना और उससे आसानी की दुआ करना सुन्नत है। यह इंसान के आज़िज़ (humble) होने की निशानी है।
सवाल: क्या क़र्ज़ देने वाले के लिए भी दुआ की जा सकती है?
जवाब: बिल्कुल, जो शख़्स आपकी मजबूरी में काम आता है, उसे दुआ देना सुन्नत-ए-नबवी है। इससे दोनों के दरमियान मुहब्बत और माल में बरकत बढ़ती है।
आख़िरी बात
क़र्ज़ का मामला निहायत हस्सास (sensitive) है। इसमें सच्चाई, ज़िम्मेदारी और अल्लाह का डर (तक़वा) होना बेहद ज़रूरी है। दुआ हमें सिर्फ़ रूहानी सहारा ही नहीं देती, बल्कि यह हमें याद दिलाती है कि हर मुश्किल का हल अल्लाह के पास है।
अपनी नियत को साफ़ रखें, अमानत को वक़्त पर लौटाने की पूरी कोशिश करें और अल्लाह से बरकत और आसानी की दुआ मांगते रहें। यक़ीनन, अल्लाह नेक नियत रखने वालों की मदद फ़रमाता है।


