Quick Summary
Dua Name
Debt Relief And Financial Freedom
Arabic Text
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ
Hindi Transliteration
अल्लाहुम्मक-फ़िनी बि-हलालिका अन हरामिका, व-अग्निनी बि-फ़ज़्लिका अम्मन सिवाका।
English Transliteration
Allahummak-fini bi-halalika an haramika, w-agnini bi-fzlika amman siwaka.
Source
जामी तिरमिज़ी (हदीस नंबर 3563)
आज के इस महंगाई के वक़्त में अपनी ज़रूरतों को पूरा करना और Financial Freedom (माली आज़ादी) हासिल करना हर इंसान का ख़्वाब होता है। लेकिन अक्सर हालात ऐसे बन जाते हैं कि बहुत से लोग क़र्ज़ (Debt) के भारी बोझ तले दब जाते हैं।
दीन-ए-इस्लाम में क़र्ज़ को बहुत संजीदगी से लिया गया है। नबी-ए-करीम (ﷺ) ने उम्मत को तालीम दी है कि जहां तक मुमकिन हो क़र्ज़ से बचें, लेकिन अगर मजबूरी में क़र्ज़ लेना पड़ जाए, तो उसे जल्द से जल्द अदा करने की फिक्र करें। अगर आप या आपका कोई अज़ीज़ क़र्ज़ के बोझ से परेशान है, तो अल्लाह की बारगाह में रुजू करें। इस मुकम्मल गाइड में हम Qarz utarne ki dua, क़र्ज़ के इस्लामी आदाब और माली आज़ादी (Financial Freedom) के सुन्नत तरीक़ों को तफ़सील से जानेंगे।
1. क़र्ज़ से निजात की सबसे ताक़तवर दुआ (Powerful Dua for Qarz Relief)
जब भी आप क़र्ज़ की वजह से फिक्रमंद (Anxious) हों, तो हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद और ख़ास तौर पर सुब्ह-ओ-शाम इस मसनून दुआ का विर्द करें। हज़रत अली (रज़ि.) ने फरमाया कि “अगर तुम पर पहाड़ के बराबर भी क़र्ज़ होगा, तो अल्लाह ताला इस दुआ की बरकत से उसे अदा करवा देगा।”
अरबी (Arabic):
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ
रोमन इंग्लिश (Transliteration):
Allahummak-fini bi-halalika ‘an haramika, wa-agnini bi-fazlika ‘amman siwaka.
हिंदी तर्जुमा (Hindi Translation):
“ऐ अल्लाह! मुझे अपने हलाल (रिज़्क़) के साथ अपने हराम से बचा ले, और मुझे अपने फ़ज़ल (मेहरबानी) से अपने सिवा हर किसी से बे-नियाज़ (ग़नी) कर दे।”
हवाला (Reference): यह अज़ीम दुआ जामिअ़ तिर्मिज़ी (हदीस नंबर: 3563) से साबित है।

2. क़र्ज़ लेने और देने के इस्लामी आदाब (Etiquettes of Borrowing & Lending)
इस्लाम एक मुकम्मल दीन है जो सिर्फ़ दुआएं नहीं सिखाता, बल्कि ज़िंदगी गुज़ारने का सलीक़ा भी बताता है। Qarz lene aur dene के कुछ अहम सुन्नत आदाब यह हैं:
- सच्ची नीयत (Good Intention): हदीस में आता है कि जो शख़्स लोगों का माल इस नीयत से लेता है कि वह उसे अदा करेगा, तो अल्लाह उसकी तरफ़ से अदा कर देता है (यानी अदायगी के रास्ते आसान कर देता है)।
- क़र्ज़ को लिख लेना: क़ुरआन मजीद (सूरह बक़रह) में अल्लाह का साफ़ हुक्म है कि जब भी आपस में क़र्ज़ का लेन-देन करो, तो उसे लिख लिया करो और गवाह बना लिया करो ताकि बाद में कोई ग़लतफ़हमी न हो।
- मोहल्लत (Extra Time) देना: जो शख़्स क़र्ज़ देता है, उसे चाहिए कि अगर क़र्ज़ लेने वाला तंगी में है, तो उसे कुछ और मोहल्लत (Time) दे दे। इसका अल्लाह के नज़दीक बहुत बड़ा अज़र (सवाब) है।
- बग़ैर मजबूरी क़र्ज़ न लें: दिखावे (Show-off) या गैर-ज़रूरी शौक़ पूरे करने के लिए कभी क़र्ज़ न लें। इसे सिर्फ़ शदीद मजबूरी में ही इस्तेमाल करें।
3. Financial Freedom (माली आज़ादी) के 3 रूहानी तरीक़े
Qarz utarne ki dua in Hindi पढ़ने के साथ-साथ इन 3 आमाल को भी अपनी रोज़मर्रा की आदत बनाएं:
- इस्तिग़फ़ार की कसरत: अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगना (Astaghfar) बंद दरवाज़ों को खोल देता है और रिज़्क़ में बे-हिसाब इज़ाफ़ा करता है, जो Financial Freedom की पहली सीढ़ी है।
- सदक़ा (Sadaqah) देना: आप कितने भी तंग-दस्त क्यों न हों, अपनी हैसियत के मुताबिक़ थोड़ा बहुत सदक़ा ज़रूर करते रहें। यह माल को कम नहीं करता बल्कि उसमें बरकत डालता है।
- फ़ज्र के बाद का वक़्त: सुब्ह फ़ज्र की नमाज़ के बाद सोए न रहें, बल्कि अल्लाह से रिज़्क़ तलब करें, क्योंकि नबी (ﷺ) ने सुब्ह के वक़्त में उम्मत के लिए बरकत की दुआ की है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQs)
सवाल: क्या Qarz utarne ki dua को किसी भी वक़्त पढ़ा जा सकता है?
जवाब: जी हां, आप चलते-फिरते, उठते-बैठते इस दुआ को पढ़ सकते हैं। ख़ास तौर पर फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद इसका एहतेमाम (ख़्याल) करना ज़्यादा फ़ायदेमंद है।
सवाल: अगर क़र्ज़ देने वाला मोहल्लत न दे रहा हो तो क्या करें?
जवाब: ऐसी सूरत में नरमी से बात करें, अपनी हक़ीक़ी परेशानी बताएं और ऊपर दी गई मसनून दुआ का कसरत से विर्द करें। अल्लाह दिलों को फेरने वाला है, वह आपके लिए आसांनियाँ पैदा फरमाएगा।
सवाल: क्या मरने वाले पर क़र्ज़ हो तो उसकी बख़्शिश रुक जाती है? जवाब: हदीस की रौशनी में, शहीद के तमाम गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं सिवाय क़र्ज़ के। इसलिए क़र्ज़ की अदायगी बहुत अहम है। अगर किसी का इंतिक़ाल हो जाए, तो उसके वारिसों (Heirs) की ज़िम्मेदारी है कि सबसे पहले उसके माल से उसका क़र्ज़ अदा करें।
अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हम सबको हर तरह के ज़ाहिरी और बातिनी क़र्ज़ से नजात अता फरमाए, हमारी कमाई में बरकत दे और हमें मुकम्मल Financial Freedom नसीब करे। आमीन।



