क़र्ज़ का बोझ इंसान की रातों की नींद और दिन का सुकून छीन लेता है। जब आमदनी कम हो और देनदारों का दबाव बढ़ रहा हो, तो इंसान खुद को बहुत बेबस महसूस करता है। इस मुश्किल घड़ी में जहाँ अपनी कोशिशें ज़रूरी हैं, वहीं अल्लाह की तरफ़ रुजू करना और उससे मदद माँगना सबसे बड़ा सहारा है।
इस्लाम और क़र्ज़ की ज़िम्मेदारी
इस्लाम में क़र्ज़ की अदायगी को बहुत अहमियत दी गई है। यह एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसे पूरा करने के लिए संजीदगी ज़रूरी है। अगर इंसान की नियत साफ़ हो और वह सच में क़र्ज़ चुकाना चाहता हो, तो अल्लाह तआला उसके लिए आसानियाँ पैदा फ़रमा देता है। शर्मिंदगी महसूस करना या घबराना इसका हल नहीं है, बल्कि सही रास्ते और सही दुआ का चुनाव करना ही कामयाबी का ज़रिया है।
सबसे मुस्तनद और ख़ास दुआ
हज़रत अली (रज़ि.) की रिवायत के मुताबिक, यह दुआ ख़ास तौर पर क़र्ज़ की अदायगी के लिए सिखाई गई है। हदीस की किताबों में इसे सबसे ज़्यादा भरोसेमंद और असरदार माना गया है।
اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ
तलफ़्फ़ुज़: अल्लाहुम्मक-फ़िनी बि-हलालिका अन हरामिका, व-अग्निनी बि-फ़ज़्लिका अम्मन सिवाका।
Roman (Hinglish):
Allahummak-fini bi-halalika ‘an haramika, wa-aghnini bi-fadlika ‘amman siwaka.
तर्जुमा:
“ऐ अल्लाह! मुझे अपनी हलाल रोज़ी के ज़रिए हराम से बचा ले (यानी हलाल मेरे लिए काफ़ी कर दे), और अपने फ़ज़्ल से मुझे अपने सिवा हर किसी से बे-नियाज़ (आज़ाद) कर दे।”
मस्दर (Source):
यह दुआ जामी तिरमिज़ी (हदीस नंबर 3563) और मुसनद अहमद में मौजूद है। यह हज़रत अली (रज़ि.) से मरवी (narrated) है, जिन्होंने फ़रमाया था कि इस दुआ की बरकत से पहाड़ बराबर क़र्ज़ भी उतर सकता है।
दुआ के साथ ये 4 बातें ज़रूरी हैं
दुआ अल्लाह से बातचीत है, लेकिन अल्लाह उन लोगों की मदद करता है जो अपनी तरफ़ से भी पूरी कोशिश करते हैं:
- पक्की नियत: अपने दिल में यह अहद (वाअदा) करें कि जैसे ही पैसे आएंगे, आप सबसे पहले क़र्ज़ उतारेंगे। नीयत की सफ़ाई से बरकत आती है।
- इस्तिग़फ़ार की कसरत: तौबा करने से बंद रास्ते खुलते हैं और रिज़्क़ की तंगी दूर होती है।
- हलाल आमदनी: कोशिश करें कि आपकी कमाई का ज़रिया पूरी तरह हलाल हो, क्योंकि हराम के साये में दुआओं का असर कम हो जाता है।
- तवक्कुल और सब्र: दुआ माँगने के बाद अल्लाह पर भरोसा रखें। रास्ते एकदम से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और बेहतर तरीक़े से खुलते हैं।
क़र्ज़ में देरी और आज़माइश
कभी-कभी दुआ और कोशिश के बावजूद क़र्ज़ उतरने में वक़्त लगता है। इसका मतलब यह नहीं कि आपकी दुआ सुन ली नहीं गई। अल्लाह कभी-कभी अपने बंदे को आज़माता है ताकि वह और ज़्यादा गिड़गिड़ा कर माँगे। जब तक क़र्ज़ बाक़ी है, हिम्मत न हारें और अपनी मेहनत जारी रखें।
लोगों के सवाल (Q&A)
क्या यह दुआ रोज़ पढ़ना ज़रूरी है?
जी हाँ, इसे अपनी ज़िंदगी का मामूल बना लें। हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद इसे 3 बार पढ़ने की आदत डालें।
अगर आमदनी बिल्कुल बंद हो जाए तो क्या दुआ काम करेगी?
दुआ अल्लाह के खज़ाने की चाबी है। जब ज़ाहिरी रास्ते बंद हो जाते हैं, तो अल्लाह ग़ैबी रास्तों से मदद पहुँचाता है। शर्त सिर्फ यक़ीन और कोशिश की है।
उम्मीद और ज़िम्मेदारी का साथ
क़र्ज़ उतारने का सफ़र सब्र माँगता है। अल्लाह से मदद माँगते रहें और अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त के लिए अपनी कोशिशों में कभी कमी न आने दें। इस्तिका़मत ही वह चीज़ है जो आपको इस आज़माइश से बाहर निकालेगी।


