Quick Summary
Dua Name
Ramadan Ki Dua
Arabic Text
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
Hindi Transliteration
अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़फ़ु अन्नी
English Transliteration
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni
Source
सही तिरमिज़ी (#3513), सही इब्न माजा
रमज़ान-उल-मुबारक का चाँद नज़र आते ही फ़िज़ाओं में एक अजीब सा सुकून और रूहानियत घुल जाती है। यह सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपनी आदतों को सँवारने और अपने रब से दोबारा जुड़ने का एक निहायत क़ीमती मौक़ा है। हमारी रोज़ाना की मसरूफ़ियत (व्यस्त) वाली ज़िंदगी में जो दूरियाँ आ जाती हैं, रमज़ान की रातें और इबादत भरे दिन उन दूरियों को मिटाने का बेहतरीन ज़रिया बनते हैं।
इस पूरे मुक़द्दस महीने में जो चीज़ एक मोमिन के साथ साये की तरह रहती है, वह है Ramadan Ki Dua।
रमज़ान का महीना और दुआ का जज़्बा
जैसे-जैसे रमज़ान के दिन गुज़रते हैं, हमारे अंदर एक ठहराव आने लगता है। सहरी का वह सन्नाटा और इफ़्तार की वह पुर-सुकून घड़ी हमें एहसास दिलाती है कि हम अपने रब के कितने मोहताज हैं। दुआ असल में हमारे दिल की वह पुकार है जो अल्फ़ाज़ बनकर ज़बान पर आती है।
रमज़ान में दुआ का जज़्बा इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि हमें पुख़्ता यक़ीन होता है कि यह महीना रहमतों और मग़फ़िरत (माफ़ी) का है। हम अपनी दुनियावी हाजात के साथ-साथ अपने अख़लाक़ और अपनी रूह की पाकीज़गी के लिए भी हाथ उठाते हैं। यह वह वक़्त होता है जब हम दिखावे से दूर, सिर्फ़ अपने परवरदिगार से गुफ़्तगू करते हैं।
रमज़ान में किस क़िस्म की दुआएं पढ़ी जाती हैं?
अक्सर लोग पूछते हैं कि रमज़ान में कौन सी दुआ सबसे बेहतर है। हक़ीक़त तो यह है कि हर वह दुआ जो सच्चे दिल से निकली हो, वह क़ीमती है। फिर भी, इस मुबारक महीने को तीन अशरों (हिस्सों) में तक़्सीम किया गया है:
- पहला अशरा (रहमत): अल्लाह ताला की रहमत और बरकत तलब करना।
- दूसरा अशरा (मग़फ़िरत): अपने पिछले तमाम गुनाहों की माफ़ी माँगना।
- तीसरा अशरा (निजात): जहन्नम की आग से ख़लासी (छुटकारा) और लैलतुल क़द्र की तलाश।
मशहूर मसनून दुआएं (Mashhoor Masnoon Duas)
यहाँ कुछ ऐसी दुआएं दी जा रही हैं जो हमारे नबी-ए-करीम (ﷺ) की सुन्नत से साबित हैं:
1. माफ़ी और मग़फ़िरत की दुआ (ख़ास तौर पर लैलतुल क़द्र के लिए)
Arabic:
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
Hindi:
अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़्वा फ़ाफ़ु अन्नी।
Roman:
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni.
तर्जुमा / मफ़हूम:
“ऐ अल्लाह! बेशक तू माफ़ करने वाला है, और माफ़ करने को पसंद फ़रमाता है, लिहाज़ा मुझे माफ़ फ़रमा दे।”
(हवाला: सहीह तिर्मिज़ी: 3513)
2. इफ़्तार के वक़्त की मसनून दुआ
Arabic:
ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ
Hindi:
ज़हबज़-ज़मउ वब्तल्लतिल उरूक़ु व सबतल अज्रु इन शा अल्लाह।
Roman:
Dhahaba-dh-dhama’u wabtallati-l-‘uruqu wa thabata-l-ajru in sha Allah.
तर्जुमा / मफ़हूम:
“प्यास बुझ गई, रगें तर हो गईं और अल्लाह ने चाहा तो अजर (सवाब) पक्का हो गया।”
(हवाला: सुनन अबू दाऊद: 2357)
30 Days 30 Duas (रमज़ान की तीस दुआएं)
चूंकि रमज़ान का हर दिन इबादत का नया पैग़ाम लाता है, इसलिए हमने क़ुरआन और हदीस की चुनिंदा मसनून दुआओं की एक फ़ेहरिस्त (List) तैयार की है ताकि आप रोज़ाना अपनी इबादत में एक नया मक़सद शामिल कर सकें।
| दिन (Day) | दुआ का मौज़ू (Topic) | अरबी दुआ (Arabic Dua) | मस्दर (Source) |
| Day 1 | रहमत की तलब | رَبِّ اغْفِرْ وَارْحَمْ وَأَنْتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ | Surah Al-Mu’minun: 118 |
| Day 2 | हिदायत पर पाबंदी | رَبَّنَا لَا تُزِغْ قُلُوبَنَا بَعْدَ إِذْ هَدَيْتَنَا | Surah Ali ‘Imran: 8 |
| Day 3 | वालिदैन (माँ-बाप) के लिए | رَّبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا | Surah Al-Isra: 24 |
| Day 4 | दुनिया-आख़िरत की भलाई | رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً | Surah Al-Baqarah: 201 |
| Day 5 | इल्म में इज़ाफ़ा | رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا | Surah Taha: 114 |
| Day 6 | सब्र और इस्तक़ामत | رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا | Surah Al-Baqarah: 250 |
| Day 7 | गुनाहों की मग़फ़िरत | رَبَّنَا فَاغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَكَفِّرْ عَنَّا سَيِّئَاتِنَا | Surah Ali ‘Imran: 193 |
| Day 8 | तौबा की क़बूलियत | رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا ۖ إِنَّكَ أَنتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ | Surah Al-Baqarah: 127 |
| Day 9 | ज़ालिमों से पनाह | رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا فِتْنَةً لِّلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ | Surah Yunus: 85 |
| Day 10 | नेक औलाद के लिए | رَبِّ هَبْ لِي مِن لَّدُنكَ ذُرِّيَّةً طَيِّبَةً | Surah Ali ‘Imran: 38 |
| Day 11 | दिल का इत्मीनान | يَا مُقَلِّبَ الْقُلُوبِ ثَبِّتْ قَلْبِي عَلَى دِينِكَ | Sunan al-Tirmidhi: 2140 |
| Day 12 | ईमान पर ख़ात्मा | تَوَفَّنِي مُسْلِمًا وَأَلْحِقْنِي بِالصَّالِحِينَ | Surah Yusuf: 101 |
| Day 13 | अज़ाब-ए-क़ब्र से पनाह | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ عَذَابِ الْقَبْرِ | Sahih Bukhari: 1377 |
| Day 14 | रिज़्क़-ए-हलाल में बरकत | اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ | Sunan al-Tirmidhi: 3563 |
| Day 15 | तंगदस्ती और ग़म से पनाह | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْهَمِّ وَالْحَزَنِ | Sahih Bukhari: 2893 |
| Day 16 | जहन्नम से दूरी | رَبَّنَا اصْرِفْ عَنَّا عَذَابَ جَهَنَّمَ | Surah Al-Furqan: 65 |
| Day 17 | शुक्र की तौफ़ीक़ | رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ | Surah Al-Naml: 19 |
| Day 18 | बुढ़ापे और काहिली से पनाह | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ | Sahih Muslim: 2706 |
| Day 19 | नमाज़ की पाबंदी | رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِن ذُرِّيَّتِي | Surah Ibrahim: 40 |
| Day 20 | सेहत और आफ़ियत | اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الْعَفْوَ وَالْعَافِيَةَ | Sunan Abi Dawud: 5074 |
| Day 21 | मुस्तक़िल मिज़ाजी | اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ الثَّبَاتَ فِي الْأَمْرِ | Sunan an-Nasa’i: 1308 |
| Day 22 | बुरी आदतों से पनाह | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ مُنْكَرَاتِ الأَخْلاَقِ | Sunan al-Tirmidhi: 3591 |
| Day 23 | अल्लाह की रज़ा | اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ رِضَاكَ وَالْجَنَّةَ | Tirmidhi |
| Day 24 | आसान मौत की दुआ | اللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى غَمَرَاتِ الْمَوْتِ | Sunan al-Tirmidhi: 978 |
| Day 25 | क़र्ज़ से छुटकारा | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الدَّيْنِ | An-Nasa’i: 5475 |
| Day 26 | लैलतुल क़द्र की दुआ | اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي | Tirmidhi: 3513 |
| Day 27 | नफ़्स की पाकीज़गी | اللَّهُمَّ آتِ نَفْسِي تَقْوَاهَا | Sahih Muslim: 2722 |
| Day 28 | फ़ित्नों से हिफ़ाज़त | اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنْ فِتْنَةِ الْمَحْيَا وَالْمَمَاتِ | Bukhari: 1377 |
| Day 29 | नेक हमसफ़र और औलाद | رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ | Surah Al-Furqan: 74 |
| Day 30 | इबादतों की क़बूलियत | رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا ۖ إِنَّكَ أَنتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ | Surah Al-Baqarah: 127 |
दुआ सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं
अक्सर हम दुआओं को सिर्फ़ रटा-रटाया जुमला समझ लेते हैं। मगर Ramadan Ki Dua का असर तब होता है जब उसमें नीयत की सच्चाई और ख़ुलूस शामिल हो। अगर हम ज़बान से माफ़ी माँग रहे हैं, लेकिन दिल में दूसरों के लिए कीना (नफ़रत) या गुनाह करने का इरादा है, तो वह दुआ बे-असर रहती है।
दुआ का मक़सद सिर्फ़ माँगना नहीं, बल्कि इस बात का इक़रार करना है कि हम अल्लाह ताला के हुक्म के आगे अपना सर झुकाते हैं।
रमज़ान में दुआ कब ज़्यादा क़बूल होती है?
यूँ तो रमज़ान का हर लम्हा क़ीमती है, लेकिन कुछ औक़ात (समय) ऐसे हैं जिन्हें हाथ से नहीं जाने देना चाहिए:
- सहरी का आख़िरी वक़्त (तहज्जुद): जब हर तरफ़ सन्नाटा होता है, वह रब से चुपके से बातें करने का सबसे बेहतरीन वक़्त है।
- इफ़्तार से ठीक पहले: उस वक़्त थकावट और प्यास के बावजूद बंदा अपने रब की याद में बैठा होता है, अल्लाह को यह अदा बहुत पसंद है।
- तरावीह के बाद का वक़्त: रात की इबादतों में दिल की गहराई से दुआ माँगने के लिए यह वक़्त बहुत मौज़ूं (मुनासिब) है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
सवाल 1: क्या एक ही दुआ पूरे रमज़ान में बार-बार पढ़ सकते हैं?
जवाब: बिल्कुल, अगर आपकी कोई ख़ास हाजत (ज़रूरत) है या आपको कोई एक दुआ बहुत अज़ीज़ है, तो आप उसे बार-बार माँग सकते हैं। अल्लाह ताला को बंदे का गिड़गिड़ाकर माँगना बहुत पसंद है।
सवाल 2: क्या रमज़ान की दुआ सिर्फ़ अरबी में ही माँगनी चाहिए?
जवाब: मसनून दुआएं अरबी में पढ़ना अफ़ज़ल है क्योंकि वे नबी (ﷺ) के अल्फ़ाज़ हैं। लेकिन अल्लाह हर ज़बान समझता है। आप अपनी मादरी ज़बान (उर्दू/हिंदी) में भी अपने दिल का हाल बयान कर सकते हैं।
आख़िरी बात: दिल की दुआ
यह मुबारक महीना गुज़र जाएगा, दस्तरख़्वान की रौनक़ें कम हो जाएँगी, लेकिन जो दुआएं आपने इन रातों में माँगी हैं, वे हमेशा आपके साथ रहेंगी।
कोशिश करें कि इस रमज़ान आपकी दुआएं सिर्फ़ दुनियावी चीज़ों तक महदूद न रहें। अपने अख़लाक़ की बेहतरी, अपने घर के सुकून और ईमान की सलामती के लिए भी वक़्त निकालें। अल्लाह ताला हम सबकी इबादतों और दुआओं को क़बूल फ़रमाए। आमीन।



