Sehri Aur Roza Rakhne Ka Irada
रमज़ान (Ramzan) के महीने में सहरी का वक़्त बड़ा ही पुर-सुकून होता है। जब घर के सब लोग, बड़े-बुज़ुर्ग और बच्चे, नींद से जाग कर दस्तरख़्वान पर बैठते हैं, तो वह मंज़र ही अलग होता है। सहरी खाना सुन्नत भी है और इसमें अल्लाह ने बरकत भी रखी है।
लेकिन सहरी सिर्फ़ खाना खाने का नाम नहीं है। यह वह वक़्त है जब हम Roza Rakhne Ki Dua पढ़कर अपने दिल को आने वाले दिन के रोज़े के लिए तैयार करते हैं। हमारे घरों में सहरी ख़त्म करने के बाद एक ख़ास दुआ पढ़ी जाती है, जिसे हम आम ज़ुबान में Sehri Ki Dua कहते हैं।
Roza Rakhne Ki Dua Kya Hai
अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या रोज़े के लिए कोई ख़ास अलफ़ाज़ बोलना ज़रूरी है? हदीस और फ़िक़्ह की किताबों में नीयत (इरादे) को असल माना गया है, लेकिन ज़ुबान से दुआ पढ़ लेने से दिल का इरादा और पक्का हो जाता है।
यहाँ हम दो दुआएँ बता रहे हैं। पहली वह जो हम बचपन से अपने घरों में सुनते और पढ़ते आए हैं, और दूसरी वह जो मुख़्तसर (छोटी) है और उसे भी पढ़ा जा सकता है।
1. Mashhoor Sehri Ki Dua (Sabse Zayada Padhi Jane Wali)
यह दुआ सबसे मुकम्मल मानी जाती है और ज़्यादातर लोग इसी को पढ़ते हैं। आप इसे सहरी खाने के बाद, लेकिन फ़जर (Fajr) का वक़्त शुरू होने से पहले पढ़ लें।
Arabic Dua
نَوَيْتُ أَنْ أَصُومَ غَدًا مِنْ فَرْضِ شَهْرِ رَمَضَانَ لِلّٰهِ تَعَالٰى
तलफ़्फ़ुज़
Navaitu an asuma ghadan min fardi shahri ramadan lillahi ta’ala
Devanagari
नवैतु अन असूम ग़दन मिन फ़र्दि शहि रमज़ान लिल्लाहि तआला
Roman (Hinglish)
Navaitu an asuma ghadan min fardi shahri ramadan lillahi ta’ala.
तर्जुमा
“मैने नियत (इरादा) की कि मैं कल रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़े का रोज़ा रखूँगा, अल्लाह तआला के लिए।”
2. Dusri Dua (Mukhtasar Niyyat)
अगर किसी को बड़ी दुआ याद न हो, या वक़्त बहुत कम हो, तो यह छोटी दुआ भी पढ़ी जा सकती है। इसका मतलब भी वही है।
Arabic Dua
وَبِصَوْمِ غَدٍ نَّوَيْتُ مِنْ شَهْرِ رَمَضَانَ
तलफ़्फ़ुज़
Wa bi-sawmi ghadin navaitu min shahri ramadan
Devanagari
व बि-सौमि ग़दिन नवैतु मिन शह्रि रमज़ान
Roman (Hinglish)
Wa bi-sawmi ghadin navaitu min shahri ramadan.
तर्जुमा
“और मैंने रमज़ान के कल के रोज़े की नियत की।”
Niyyat Dil Se Hoti Hai – Lafzon Se Nahi
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस्लाम में नीयत का असल मक़ाम “दिल” है, ज़ुबान नहीं। उलेमा बताते हैं कि अगर आपने दिल में पक्का इरादा कर लिया कि “कल मैं रोज़ा रखूँगा”, और आप इसी इरादे से सहरी के लिए उठे, तो आपकी नीयत हो गई।
ऊपर दी गई Roza Rakhne Ki Dua एक ज़ जरिया है अपने इरादे को अलफ़ाज़ देने का। यह दुआ पढ़ना अच्छी बात है और इससे रोज़े की शुरुआत में एक रूहानी एहसास होता है, लेकिन अगर कोई शख़्स सहरी के वक़्त यह दुआ ज़ुबान से न बोल पाए और दिल में इरादा हो, तब भी उसका रोज़ा दुरुस्त माना जाएगा।
इसलिए अलफ़ाज़ पर ज़्यादा परेशान होने के बजाय, दिल के खुलूस और अल्लाह की रज़ा पर ध्यान दें।
Sehri Ke Waqt Ka Adab
सहरी का वक़्त दुआओं की क़बूलियत का वक़्त होता है। इस वक़्त कुछ बातों का ख़याल रखना चाहिए:
- वक़्त का ध्यान (Timing): सहरी हमेशा सुबह सादिक़ (फ़जर की अज़ान) से पहले ख़त्म कर लें। अज़ान शुरू होने के बाद खाना-पीना जारी रखना ग़लत है।
- दुआ का एहसास: खाना खाने के बाद जब आप Sehri Ki Dua पढ़ें, तो दिल में यह एहसास हो कि आप किसके लिए भूखे रहने का वादा कर रहे हैं।
- तहज्जुद और ज़िक्र: अगर वक़्त मिले तो सहरी से पहले 2 रकात तहज्जुद पढ़ लें, यह वक़्त अल्लाह से मांगने का बेहतरीन वक़्त है।
Short Q&A (Aam Sawal Jawab)
सवाल: क्या बिना दुआ पढ़े रोज़ा हो जाता है?
जवाब: जी हाँ। अगर आपने दिल में इरादा कर लिया था और सहरी खाई थी, तो बिना ज़ुबान से दुआ बोले भी आपका रोज़ा हो जाएगा। नीयत दिल के इरादे का नाम है।
सवाल: क्या सहरी के बाद नीयत कर सकते हैं?
जवाब: बेहतर यही है कि सहरी के वक़्त या फ़जर से पहले नीयत कर ली जाए। लेकिन अगर किसी वजह से आँख नहीं खुली, तो दोपहर (ज़वाल) से पहले तक भी रोज़े की नीयत की जा सकती है, बशर्ते सुबह से कुछ खाया-पिया न हो।
सवाल: क्या औरत और बच्चे भी यह दुआ पढ़ सकते हैं?
जवाब: बिल्कुल। घर की ख्वातीन (औरतें), बुज़ुर्ग और समझदार बच्चे सभी यह दुआ पढ़ सकते हैं। बल्कि बच्चों को यह दुआ याद कराना उनके अंदर रोज़े का शौक़ पैदा करता है।
नियत, सब्र और रोज़ा
आख़िरी बात यह है कि रोज़ा सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह सब्र और तक़्वा (परहेज़गारी) का नाम है। जब आप Roza Rakhne Ki Dua पढ़कर रोज़े की शुरुआत करें, तो कोशिश करें कि पूरा दिन ग़लत कामों, झूठ और ग़ीबत से बचें। अल्लाह हम सबकी नीयतों को साफ़ रखे और हमारे रोज़ों को क़बूल फ़रमाए।


