सफ़ा और मरवा की पहाड़ियाँ अल्लाह की निशानियों में से हैं। जब एक मोमिन हज या उमराह के लिए मक्का मुकर्रमा की पाक सरज़मीन पर हाज़िर होता है, तो ‘सई’ (सफ़ा और मरवा के बीच सात चक्कर लगाना) उसकी इबादत का एक बेहद अहम हिस्सा होता है। यह सिर्फ एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी तक चलना नहीं है, बल्कि यह अपने परवरदिगार की तरफ़ रुजू करने और उसकी अज़मत का इक़रार करने का नाम है।
इन पहाड़ों पर खड़े होकर दुआ करना सुन्नत-ए-रसूल ﷺ है। यह वह मुक़ाम है जहाँ इंसान दुनिया की तमाम फ़िक्रों को पीछे छोड़कर सिर्फ अपने ख़ालिक़ के सामने झुकता है।
सफ़ा और मरवा का एहसास
जब हाजी सफ़ा पहाड़ी पर चढ़ता है और वहाँ से बैतुल्लाह (काबा शरीफ़) की तरफ़ रुख़ करता है, तो दिल में एक ख़ास तरह की आज़ज़ी और तवाज़ु पैदा होनी चाहिए। यह वह जगह है जहाँ हज़रत हाजरा (अलैहिस्सलाम) ने अपने मासूम बच्चे के लिए पानी की तलाश में दौड़ लगाई थी। आज हम उन्हीं की याद में यहाँ सई करते हैं।
यहाँ दुआ माँगने का मक़सद यह है कि बंदा अपनी कमज़ोरी को माने और अल्लाह की ताक़त और उसकी बड़ाई को ज़बान और दिल से बयान करे। सफ़ा और मरवा पर खड़े होकर की जाने वाली इबादत में दिखावा नहीं, बल्कि रूह का सुकून और अल्लाह पर कामिल भरोसा झलकता है।
सई में दुआ का मक़ाम
सई के दौरान ज़िक्र और दुआ की बहुत अहमियत है। अक्सर लोग सई को सिर्फ एक जिस्मानी मशक्कत समझते हैं, जबकि यह असल में याद-ए-इलाही का एक ज़रिया है। सफ़ा और मरवा पर पहुँचकर ज़रा ठहरना, अल्लाह की तरफ़ रुख़ करना और मसनून दुआ पढ़ना सुन्नत है।
यह लम्हा अल्लाह से अपनी हाजतें बयान करने और उससे रहमत माँगने का बेहतरीन वक़्त होता है। सुन्नत का अदब यही है कि हम उन्हीं अल्फाज़ का सहारा लें जो हमारे नबी ﷺ ने हमें सिखाए हैं।
सफ़ा और मरवा पर पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ
जब आप सफ़ा या मरवा की पहाड़ी पर पहुँचें और काबा शरीफ़ नज़र आए, तो दोनों हाथ दुआ के लिए उठाएँ और तीन बार अल्लाह की बड़ाई (अल्लाहु अकबर) बयान करने के बाद यह दुआ पढ़ें। यह दुआ सहीह मुस्लिम की रिवायत से साबित है और अल्लाह की वहदानियत (एक होने) का सबसे बड़ा इक़रार है।
Arabic Dua
لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ لَا شَرِيكَ لَهُ، لَهُ الْمُلْكُ وَلَهُ الْحَمْدُ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ، لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَحْدَهُ، أَنْجَزَ وَعْدَهُ، وَنَصَرَ عَبْدَهُ، وَهَزَمَ الْأَحْزَابَ وَحْدَهُ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi)
ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरी-क लहू, लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर। ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहू, अन्ज-ज़ वअदहू, व न-स-र अबदहू, व ह-ज़-मल अहज़ा-ब वहदहू।
Roman (Hinglish)
La ilaha illallahu wahdahu la sharika lahu, lahul-mulku wa lahul-hamdu wa huwa ‘ala kulli shay’in qadir. La ilaha illallahu wahdahu, anjaza wa’dahu, wa nasara ‘abdahu, wa hazamal-ahzaba wahdah.
तर्जुमा
“अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है, उसका कोई शरीक नहीं। उसी के लिए सारी बादशाही है और उसी के लिए तमाम तारीफ़ें हैं और वह हर चीज़ पर क़ादिर है। अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, वह अकेला है; उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बंदे की मदद फ़रमाई और (कुफ़्र के) तमाम लश्करों को अकेले ही शिकस्त दी।”
मस्दर (Source): यह दुआ सहीह मुस्लिम (हदीस नंबर: 1218) में रिवायत की गई है और हज व उमराह की सबसे मुस्तनद दुआओं में से एक है।
दुआ और दिल की हाालत
दुआ सिर्फ लफ़्ज़ों को दोहराने का नाम नहीं है। जब आप सफ़ा और मरवा पर खड़े हों, तो आपके दिल में अल्लाह का डर और उसकी मुहब्बत दोनों होनी चाहिए।
- ख़ामोशी और सुकून: दुआ के वक़्त शोर-शराबे से बचें। अपनी आवाज़ को धीमा रखें और पूरे इत्मीनान के साथ अल्लाह से लौ लगाएँ।
- अल्लाह पर भरोसा: इस दुआ में ‘वादा पूरा करने’ और ‘मदद करने’ का ज़िक्र है। यह हमें सिखाता है कि जब हम अल्लाह को पुकारते हैं, तो वह हमें अकेला नहीं छोड़ता।
- आज़ज़ी (Humility): सई के दौरान ख़ुद को अल्लाह का एक मामूली बंदा समझकर चलें। आपकी चाल और आपकी दुआ, दोनों में आज़ज़ी झलकनी चाहिए।
दो मुख़्तसर सवाल
1. क्या सफ़ा और मरवा पर सिर्फ यही दुआ पढ़ी जाती है?
ऊपर दी गई दुआ मसनून है, यानी हमारे नबी ﷺ से साबित है। इसे तीन बार पढ़ना सुन्नत है। इसके अलावा आप अपनी पसंद की कोई भी जायज़ दुआ अपनी ज़बान में माँग सकते हैं। अल्लाह हर ज़बान और हर दिल की आवाज़ सुनता है।
2. अगर दुआ पूरी याद न हो, तो क्या अल्लाह क़ुबूल करता है?
अल्लाह नियतों को देखता है। अगर आपको अरबी दुआ पूरी याद नहीं है, तो आप उसे देखकर पढ़ सकते हैं या उसका तर्जुमा ज़हन में रखकर अल्लाह की हम्द (तारीफ़) कर सकते हैं। ज़रूरी यह है कि आप अल्लाह की बड़ाई का इक़रार करें।
आख़िरी बात
सफ़ा और मरवा की यह सई हमें सब्र और तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) सिखाती है। जब आप इस मसनून दुआ को पूरे यकीन के साथ पढ़ते हैं, तो यह आपके उमराह या हज की रूहानियत को और बढ़ा देती है। अल्लाह की ज़ात से उम्मीद रखें कि वह आपकी इस इबादत और दुआ को अपनी रहमत से ज़रूर क़ुबूल फ़रमाएगा। कोशिश करें कि इन मुबारक जगहों पर अपना ज़्यादातर वक़्त अल्लाह के ज़िक्र और तौबा-इस्तिग़फ़ार में गुज़ारें।


