सर दर्द और बेचैनी का एहसास
दिन भर की भाग-दौड़, घर की ज़िम्मेदारियां या दफ़्तर का काम—कभी-कभी थकान इतनी बढ़ जाती है कि सर फटने लगता है। वह भारीपन और टीस इंसान को चिड़चिड़ा बना देती है। ऐसे में न किसी काम में दिल लगता है और न ही चैन मिलता है। हम अक्सर चाय पीते हैं या कोई दवा लेते हैं, लेकिन रूहानी तौर पर भी एक सहारे की तलाश रहती है। वह बेचैनी जो जिस्म के साथ-साथ ज़हन को भी थका दे, उसका हल सिर्फ सुकून में है।
इस्लाम में दर्द और शिफ़ा का तसव्वुर
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हमें सिखाया है कि मोमिन को पहुँचने वाली हर छोटी-बड़ी तकलीफ़, यहाँ तक कि एक काँटा चुभना भी, उसके गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया बन सकता है। बीमारी या सर दर्द होना कोई बुरी बात नहीं, बल्कि यह एक तरह का इम्तिहान है। हमें यकीन रखना चाहिए कि बीमारी देने वाला अल्लाह है, तो शिफ़ा की चाबी भी उसी के पास है। दुआ मांगना बेबसी नहीं, बल्कि सबसे बड़े मालिक के सामने अपनी ज़रूरत रखने का एक खूबसूरत तरीक़ा है।
Masnoon Dua for Sar Dard
जब भी सर में दर्द महसूस हो, तो घबराने या परेशान होने के बजाय सुन्नत के मुताबिक इस दुआ को अपनाएं।
Arabic Dua
بِاسْمِ اللهِ (3 बार)
أَعُوذُ بِعِزَّةِ اللهِ وَقُدْرَتِهِ مِنْ شَرِّ مَا أَجِدُ وَأُحَاذِرُ (7 बार)
तलफ़्फ़ुज़
बिस्मिल्लाह (तीन बार कहें)
अऊज़ु बिइज़्ज़तिल्लाहि व कुदरतिही मिन शर्रि मा अजिदु व उहाज़िरु (सात बार पढ़ें)
Roman (Hinglish)
Bismillah (3 times)
A’udhu bi’izzatillahi wa qudratihi min sharri ma ajidu wa uhadhiru (7 times)
तर्जुमा
अल्लाह के नाम के साथ। मैं अल्लाह की इज़्ज़त और उसकी कुदरत की पनाह मांगता हूँ उस चीज़ की बुराई (दर्द) से जिसे मैं महसूस कर रहा हूँ और जिससे मैं डरता हूँ।
Masdar
यह दुआ सही मुस्लिम (हदीस: 2202) में ज़िक्र की गई है। हदीस के मुताबिक, जहाँ दर्द हो वहाँ हाथ रखकर इसे पढ़ना चाहिए।
दुआ के साथ क्या याद रखें
- यक़ीन: दुआ पढ़ते वक़्त पूरा भरोसा रखें कि अल्लाह ज़रूर राहत देगा। बेदिली से पढ़ी गई दुआ के मुक़ाबले पूरे दिल से मांगी गई दुआ जल्दी असर करती है।
- सब्र: दर्द की शिद्दत में ज़ुबान पर शिकवा न लाएं। याद रखें कि यह दर्द आपके दर्जात बुलंद करने का ज़रिया है।
- तरीक़ा: सुन्नत के मुताबिक, अपना सीधा हाथ सर के उस हिस्से पर रखें जहाँ दर्द हो रहा है, फिर ऊपर दी गई दुआ को बताई गई तादाद में पढ़ें।
अगर दर्द बरक़रार रहे
दुआ का मतलब दवा को छोड़ना नहीं है। हमारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने खुद भी इलाज करवाया है और दवा लेने की हिदायत दी है। अगर सर दर्द बहुत ज़्यादा है और दुआ के बाद भी आराम नहीं मिल रहा, तो मुस्तनद हकीम या डॉक्टर से मशवरा ज़रूर करें। दुआ और दवा को साथ लेकर चलना ही मोमिन का तरीक़ा है। जब तक आराम न आए, ज़िक्र और इबादत के ज़रिए दिल को सुकून पहुंचाते रहें।
Short Q&A (Real Searches)
क्या बच्चों के सर दर्द के लिए यह दुआ पढ़ सकते हैं?
जी हाँ, अगर बच्चा छोटा है और खुद नहीं पढ़ सकता, तो वालिदैन अपना हाथ उसके सर पर रखकर यह दुआ पढ़ सकते हैं और दम कर सकते हैं।
क्या इसे किसी भी वक़्त पढ़ा जा सकता है?
यह दुआ किसी भी वक़्त और कितनी भी बार पढ़ी जा सकती है। इसके लिए वज़ू होना शर्त नहीं है, लेकिन पाक-साफ होकर पढ़ना अफ़ज़ल है।
दर्द में सब्र और दुआ
आख़िरी बात यह है कि सर दर्द जैसी छोटी तकलीफ़ भी हमें अल्लाह के करीब ले आती है। जब हम अपना हाथ सर पर रखकर “बिस्मिल्लाह” कहते हैं, तो हमारा रिश्ता अपने खालिक से मज़बूत होता है। दर्द दवा से ठीक हो या न हो, मगर दुआ से मिलने वाला दिली सुकून इंसान को अंदर से मज़बूत बना देता है। दुआ जारी रखें और अल्लाह की रहमत से कभी मायूस न हों।


