Quick Summary
Dua Name
Shab-E-Qadr / Laylatul Qadr Ki Dua
Arabic Text
اللهم إنك عفو تحب العفو فاعف عني
Hindi Transliteration
अल्लाहुम्मा इन्नका अफ़ुव्वुन तुहिब्बुल अफ़वा फ़फ़ु अन्नी
English Transliteration
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni
Source
सही तिरमिज़ी 3513, सही इब्न माजा 3850
रमज़ानुल मुबारक का महीना अल्लाह की रहमतों और बरकतों का महीना है, लेकिन इसकी आख़िरी 10 रातें (Last 10 Nights) सबसे ज़्यादा अज़ीम हैं। इन्हीं ताक़ रातों (21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रात) में से एक रात शब-ए-क़द्र (Laylatul Qadr) होती है, जिसे क़ुरआन मजीद में हज़ार महीनों (लगभग 83 साल) की इबादत से बेहतर बताया गया है।
इस मुक़द्दस रात में अल्लाह ताला अपने बंदों की मग़फ़िरत (माफ़ी) फरमाता है और आने वाले साल के फ़ैसले लिखता है। अगर आप रमज़ान की आख़िरी रातों में इबादत का एहतेमाम कर रहे हैं, तो हदीस में बताई गई यह Shab-e-Qadr ki dua कसरत से पढ़ें। इस मुकम्मल गाइड में हम लैलतुल क़द्र की मसनून दुआ और आख़िरी 10 रातों के अहम आमाल के बारे में जानेंगे।
1. शब-ए-क़द्र की मसनून दुआ (Laylatul Qadr Ki Dua)
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा (रज़ि.) फरमाती हैं कि उन्होंने नबी-ए-करीम (ﷺ) से पूछा: “या रसूलल्लाह! अगर मुझे मालूम हो जाए कि कौन सी रात शब-ए-क़द्र है, तो मैं उस रात क्या दुआ मांगूं?”
नबी-ए-करीम (ﷺ) ने उन्हें यह छोटी लेकिन निहायत जामे (Complete) दुआ सिखाई, जो हर मुसलमान को रमज़ान की आख़िरी 10 रातों में कसरत से पढ़नी चाहिए:
अरबी (Arabic):
اللَّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
रोमन इंग्लिश (Transliteration):
Allahumma innaka ‘afuwwun tuhibbul ‘afwa fa’fu ‘anni.
हिंदी तर्जुमा (Hindi Translation):
“ऐ अल्लाह! बेशक तू बहुत माफ़ करने वाला है, माफ़ करने को पसंद फरमाता है, लिहाज़ा मुझे माफ़ फरमा दे।”
हवाला (Reference): यह हदीस जामिअ़ तिर्मिज़ी (हदीस नंबर: 3513) और सुनन इब्ने माजह से साबित है।
2. रमज़ान की आख़िरी 10 रातों के अहम आमाल (Ibadat in Last 10 Nights)
शब-ए-क़द्र सिर्फ़ जागने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने रब को राज़ी करने का बेहतरीन वक़्त है। इन रातों को क़ीमती बनाने के लिए इन सुन्नतों पर अमल करें:
- तौबा और अस्तग़फ़ार: अपनी पूरी ज़िंदगी के गुनाहों पर शर्मिंदगी महसूस करें और अल्लाह से सच्ची तौबा करें। ऊपर बताई गई Laylatul Qadr dua को चलते-फिरते, उठते-बैठते पढ़ते रहें।
- क़ियामुल लैल (तहज्जुद): नबी (ﷺ) आख़िरी 10 रातों में अपनी कमर कस लेते थे और रात भर इबादत करते थे। इन रातों में नमाज़-ए-तहज्जुद का ख़ास एहतेमाम करें।
- क़ुरआन की तिलावत: शब-ए-क़द्र वही रात है जिसमें क़ुरआन मजीद नाज़िल हुआ। इसलिए इन रातों में क़ुरआन की तिलावत ज़्यादा से ज़्यादा करें।
- एतिकाफ़ (I’tikaf): अगर मुमकिन हो तो रमज़ान के आख़िरी अशरे (10 दिन) का एतिकाफ़ करें, क्योंकि नबी-ए-करीम (ﷺ) हर साल एतिकाफ़ फरमाते थे ताकि शब-ए-क़द्र तलाश कर सकें।
3. शब-ए-क़द्र की निशानियां (Signs of Laylatul Qadr)
हदीस-ए-पाक में शब-ए-क़द्र की कुछ निशानियां बताई गई हैं, ताकि मोमिन इसे महसूस कर सकें:
- वह रात न तो बहुत ज़्यादा गर्म होती है और न ही बहुत ज़्यादा ठंडी।
- उस रात में एक अजीब सा सुकून और इत्मीनान (Peace) महसूस होता है।
- उस रात के बाद जो सुब्ह होती है, उसका सूरज बिना तेज़ किरणों (Without strong rays) के, एक थाली की तरह साफ़ निकलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQs)
सवाल: शब-ए-क़द्र (Laylatul Qadr) कौन सी रात होती है?
जवाब: सहीह अहादीस के मुताबिक़, शब-ए-क़द्र को रमज़ान के आख़िरी अशरे (Last 10 Days) की ताक़ रातों (Odd Nights) यानी 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं रात में तलाश करना चाहिए।
सवाल: क्या Shab-e-qadr ki dua को नमाज़ के सज्दे में पढ़ सकते हैं?
जवाब: जी हां, नफ़्ल या तहज्जुद की नमाज़ के सज्दे में अरबी दुआएं मांगी जा सकती हैं। आप सज्दे की हालत में भी यह दुआ पढ़ सकते हैं क्योंकि सज्दे में बंदा अल्लाह के सबसे क़रीब होता है।
सवाल: क्या औरतें नापाकी (Periods) की हालत में यह दुआ पढ़ सकती हैं?
जवाब: जी बिल्कुल, ख़वातीन (औरतें) नापाकी के दिनों में नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत नहीं कर सकतीं, लेकिन वह ज़िक्र, अस्तग़फ़ार और Allahumma innaka afuwwun वाली यह दुआ कसरत से पढ़ सकती हैं।
अल्लाह ताला हम सबको रमज़ान की आख़िरी 10 रातों की क़द्र करने और शब-ए-क़द्र की बरकतें समेटने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।



