Shadi Ki Dua Jaldi Hone Ki | शादी जल्दी होने की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

शादी की दुआ जल्दी होने की

رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ، وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا
तलफ़्फ़ुज़:
रब्बना हब लना मिन अज़वाजिना व ज़ुर्रियातिना क़ुर्रता अयुन, वज्अलना लिल-मुत्तक़ीना इमामा।
तर्जुमा:
ऐ हमारे रब, हमें हमारी बीवियों और औलाद की तरफ़ से आंखों की ठंडक अता फरमा, और हमें परहेज़गारों का रहनुमा बना दे।
मसदर: 
सूरह अल-फ़ुरक़ान, आयत 74
shadi ki dua jaldi hone ki main

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इंतज़ार और वह अनकही खामोशी

ज़िंदगी के एक मोड़ पर आकर जब इंसान अपने लिए एक नेक शरीक-ए-हयात (जीवनसाथी) की तमन्ना करता है, तो वह सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं बल्कि सुकून की तलाश होती है। कभी-कभी अपनों के सवाल, उम्र का बढ़ता हुआ एहसास और आस-पास के लोगों की शादियाँ देखकर दिल में एक अजीब सी बेचैनी घर कर लेती है।

अक्सर हम ख़ुद से पूछते हैं कि “क्या मुझमें कोई कमी है?” या “मेरे लिए रास्ते बंद क्यों हैं?” याद रखिए, यह देरी आपकी नाकामी नहीं है। शादी का होना या न होना अल्लाह के फ़ैसलों में से एक है। वह आपकी ख़ामोश सिसकियों और उस बोझ को समझता है जो आप किसी से कह नहीं पाते।

निकाह: अल्लाह की हिकमत और सही वक़्त

इस्लाम में निकाह को आधा दीन कहा गया है, लेकिन इसके लिए अल्लाह ने हर इंसान का एक वक़्त मुक़र्रर (तय) किया है। अल्लाह का हर काम हिकमत से भरा होता है। कभी वह हमें किसी मुश्किल रिश्ते से बचाने के लिए इंतज़ार करवाता है, तो कभी हमें सही इंसान के लिए तैयार कर रहा होता है। यह वक़्त पैनिक करने का नहीं बल्कि उस ज़ात पर तवक्कुल (भरोसा) करने का है जो चरिंद-परिंद को भी तन्हा नहीं छोड़ती।

मसनून दुआएँ: निकाह और आसानी के लिए

अल्लाह के सामने अपनी हाजत रखना इबादत है। यहाँ हम कुछ ऐसी मसनून दुआएँ ज़िक्र कर रहे हैं जो क़ुरान और हदीस की रौशनी में बेहद अफ़ज़ल हैं:

पहली दुआ: सुकून और नेक साथी के लिए

رَبَّنَا هَبْ لَنَا مِنْ أَزْوَاجِنَا وَذُرِّيَّاتِنَا قُرَّةَ أَعْيُنٍ وَاجْعَلْنَا لِلْمُتَّقِينَ إِمَامًا

तलफ़्फ़ुज़ (Arabic):

रब्बना हब लना मिन अज़वाजिना व ज़ुर्रिय्यातिना कुर्रता अ’युनिन वज-अल्ना लिल-मुत्तक़ीना इमामा।

तर्जुमा: “ऐ हमारे रब! हमें हमारी बीवियों (या शौहरों) और औलाद से आँखों की ठंडक अता फ़रमा और हमें मुत्तक़ी लोगों का पेशवा बना दे।”

मस्दर (Reference):

सूरह अल-फ़ुरक़ान, आयत 74


दूसरी दुआ: अकेलेपन से नजात के लिए

यह दुआ हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम की है, जो उन्होंने तन्हाई को दूर करने के लिए अल्लाह से मांगी थी:

رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ

तलफ़्फ़ुज़ (Arabic):

रब्बी ला तज़रनी फ़रदंव-व अन्ता ख़ैरुल वारिसीन।

तर्जुमा: “ऐ मेरे रब! मुझे अकेला न छोड़, और तू बेहतरीन वारिस है।”

मस्दर (Reference):

सूरह अल-अम्बिया, आयत 89


दुआ के साथ कुछ ज़रूरी बातें

सिर्फ़ दुआ कर लेना काफ़ी नहीं होता, उसके साथ कुछ अमली क़दम और आदाब भी ज़रूरी हैं:

  • पाबंदी-ए-नमाज़: दुआ की कुबूलियत के लिए फ़र्ज़ नमाज़ों की पाबंदी सबसे पहला सीढ़ी है।
  • हलाल कोशिश: अच्छे रिश्तों की तलाश जारी रखें और रिश्तेदारों या दोस्तों के ज़रिए कोशिश करना सुन्नत के ख़िलाफ़ नहीं है।
  • इस्तिग़फ़ार: अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते रहें, क्योंकि कभी-कभी हमारे अपने अमल ही रिज़्क़ और रिश्तों में रुकावट बन जाते हैं।
  • शुक्रगुज़ारी: जो आपके पास अभी है, उस पर अल्लाह का शुक्र अदा करें।

जब दिल में बेचैनी बढ़ जाए

जब आप सोशल मीडिया पर दूसरों की शादियों की तस्वीरें देखें या कोई रिश्तेदार चुभती हुई बात कहे, तो एक गहरी सांस लें और कहें: “अल्लाह मेरे लिए काफ़ी है।” अल्लाह को आपकी उम्र या हालात की कोई मजबूरी नहीं है। वह जब ‘कुन’ (हो जा) कहता है, तो रुकी हुई बातें भी बन जाती हैं। अपनी क़दर दूसरों की राय से न करें। आप अल्लाह की एक कीमती मख़लूक़ हैं और आपका जोड़ा उसने पहले ही लिख दिया है।

आम सवाल (Q&A)

सवाल: क्या लड़कियां और लड़के दोनों ये दुआ पढ़ सकते हैं?

जवाब: जी हाँ, ये दुआएँ क़ुरान-ए-पाक का हिस्सा हैं और कोई भी मुसलमान (मर्द या औरत) इन्हें अपनी ज़रूरत के लिए पढ़ सकता है।

सवाल: क्या दुआ पढ़ने का कोई खास वक़्त है?

जवाब: वैसे तो दुआ कभी भी की जा सकती है, लेकिन तहज्जुद का वक़्त, अज़ान और इक़ामत के बीच का वक़्त और नमाज़ के बाद दुआ की कुबूलियत के इमकान (संभावना) ज़्यादा होते हैं।

सवाल: अगर रिश्ता आकर बार-बार टूट जाए तो क्या करें?

जवाब: इसे अल्लाह की मर्ज़ी समझें। मुमकिन है कि वह रिश्ता आपके हक में बेहतर न हो। दुआ जारी रखें और अपने मिज़ाज और अख़लाक़ की इस्लाह (सुधार) पर भी ध्यान दें।

सब्र और भरोसे की राह

याद रखिए, दुआ कोई जादू की छड़ी नहीं बल्कि अल्लाह से एक बातचीत है। अपनी आज़माइश को अल्लाह से दूर होने का सबब न बनने दें। आपका काम है सलीके से मांगना और उसका काम है बेहतरीन वक़्त पर अता करना। जब तक आपकी मुराद पूरी नहीं होती, अल्लाह आपको उस इंतज़ार का भी अज्र (इनाम) देता है।