Shaitan se Bachne Ki Dua | शैतान के वसवसे से हिफ़ाज़त की दुआ

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मुख़्तसर रहनुमाई

शैतान के वसवसे से हिफ़ाज़त की दुआ

رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ
तलफ़्फ़ुज़:
रब्बी अऊज़ु बिका मिन हमज़ातिश-शयातीनि व अऊज़ु बिका रब्बी अंय-यह्ज़ुरून
तर्जुमा:
ऐ मेरे रब! मैं शैतानों के वसवसों से तेरी पनाह मांगता हूँ और ऐ मेरे परवरदिगार! मैं इससे भी तेरी पनाह मांगता हूँ कि वह मेरे पास आएं।
मसदर: 
सूरह अल-मुअमिनून (आयत: 97-98)
shaitan se bachne ki dua main

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इंसान की ज़िंदगी में आज़माइश का एक बड़ा हिस्सा शैतान की तरफ से आने वाले वसवसे हैं। शैतान का बुनियादी मक़सद इंसान को अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल करना और उसे गुनाह की तरफ मायल करना है। इस्लाम हमें यह सिखाता है कि शैतान हमारा खुला दुश्मन है, लेकिन साथ ही हमें वह ज़राय भी दिए गए हैं जिनसे हम अपनी रूहानी हिफ़ाज़त कर सकें। Shaitan se bachne ki dua और अल्लाह का ज़िक्र वह मज़बूत ढाल है जो हमें इस दुश्मन के शर से महफ़ूज़ रखती है।

Shaitan Aur Insaan Ki Kamzori

शैतान इंसान पर सीधा हमला करने के बजाय उसकी फितरी कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाता है। उसका सबसे बड़ा हथियार ‘वसवसा’ यानी दिल में बुरे खयालात डालना है। वह इंसान को अल्लाह की रहमत से मायूस करता है या फिर गुनाह को खूबसूरत बना कर पेश करता है। इंसान जब जज्बाती तौर पर कमज़ोर होता है या ज़िक्र-ए-इलाही से दूर होता है, तो वह इन वसवसों का शिकार आसानी से बन जाता है। यह समझना ज़रूरी है कि वसवसे आना महज़ एक ज़हनी कैफियत नहीं बल्कि एक रूहानी जंग है जिसमें हमें अल्लाह की पनाह की ज़रूरत होती है।

Kab Insaan Shaitan Ke Qareeb Ho Jata Hai

हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कुछ ऐसे मक़ाम आते हैं जहाँ शैतान के लिए रास्ता बनाना आसान हो जाता है। जब इंसान शदीद गुस्से में होता है, तो उसकी अक्ल पर पर्दा पड़ जाता है और वह वही करता है जो शैतान चाहता है। इसी तरह, तन्हाई में जब कोई देखने वाला न हो, तो नफ्स की पैरवी करना आसान हो जाता है। नमाज़ में सुस्ती या इबादत के दौरान ज़हन का भटकना भी इस बात की अलामत है कि शैतान हमें ज़िक्र से दूर रखने की कोशिश कर रहा है। जब हम अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल होकर दुनिया के कामों में हद से ज़्यादा मसरूफ हो जाते हैं, तब शैतान के लिए हमारे दिल में जगह बनाना मुमकिन हो जाता है।

Masnoon Duas for Protection from Shaitan

कुरान और अहादीस में शैतान के शर से बचने के लिए वाज़ेह दुआएं मौजूद हैं। यहाँ दो ऐसी दुआएं दी जा रही हैं जो सनद के लिहाज़ से निहायत मोतबर और मुस्तनद हैं।

Arabic Dua

أَعُوذُ بِاللَّهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ

तलफ़्फ़ुज़

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश-शैतानिर-रजीम

Roman (Hinglish)

A’udhu billahi minash-shaitanir-rajeem

तर्जुमा

मैं अल्लाह की पनाह मांगता हूँ शैतान मरदूद से।

Masdar

स़हीह बुखारी व मुस्लिम (ताअव्वुज़)


Arabic Dua

رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ

तलफ़्फ़ुज़

रब्बी अऊज़ु बिका मिन हमज़ातिश-शयातीनि व अऊज़ु बिका रब्बी अंय-यह्ज़ुरून

Roman (Hinglish)

Rabbi a’udhu bika min hamazatish-shayateeni wa a’udhu bika rabbi ay-yahduroon

तर्जुमा

ऐ मेरे रब! मैं शैतानों के वसवसों से तेरी पनाह मांगता हूँ और ऐ मेरे परवरदिगार! मैं इससे भी तेरी पनाह मांगता हूँ कि वह मेरे पास आएं।

Masdar

सूरह अल-मुअमिनून (आयत: 97-98)

Sirf Dua Hi Kaafi Kyun Nahi Hoti

दुआ माँगना यक़ीनन इबादत है, लेकिन इसके साथ अमल की भी उतनी ही अहमियत है। अल्लाह से हिफ़ाज़त तलब करने का मतलब यह भी है कि हम उन रास्तों से बचें जो हमें गुनाह की तरफ ले जाते हैं। अगर हम ज़बान से पनाह मांग रहे हैं लेकिन अपने माहौल को दुरुस्त नहीं कर रहे, तो यह खुद को धोखे में रखने जैसा है। नेक सोहबत, पाँचों वक्त की नमाज़ की पाबंदी और अपने अख़लाक़ की निगरानी वह अमली क़दम हैं जो दुआ के असर को मुस्तहकम करते हैं। छोटी मगर मुस्तकिल इबादत दिल को इतना मज़बूत कर देती है कि शैतान के वसवसे बेअसर होने लगते हैं।

Rozana Zindagi Mein Shaitan Se Bachav Ka Andaz

अपने दिन की शुरुआत और इख्तिताम अल्लाह के ज़िक्र से करना एक मोमिन का तरीका होना चाहिए। सुबह और शाम के अज़कार हमें पूरे दिन के लिए एक रूहानी हिफ़ाज़ती घेरे में ले लेते हैं। जब भी गु़स्सा आए, तो फौरन ‘अऊज़ु बिल्लाह’ पढ़ने की आदत डालनी चाहिए क्योंकि यह सीधे तौर पर शैतान के वार को नाकाम करता है। वज़ू की हालत में रहना और घर में दाखिल होते वक्त या खाना खाते वक्त ‘बिस्मिल्लाह’ कहना भी छोटे लेकिन निहायत असरदार तरीके हैं। इन आदाब को ज़िंदगी का हिस्सा बनाने से इंसान धीरे-धीरे शैतानी असरत से दूर होता चला जाता है।

Short Q&A

क्या शैतान के वसवसे आना गुनाह है?
जी नहीं, सिर्फ दिल में वसवसा आना गुनाह नहीं है। जब तक इंसान उस वसवसे पर अमल न करे या उसे अपनी पसंद से दिल में जगह न दे, तब तक उस पर पकड़ नहीं होती। बल्कि वसवसे को बुरा समझना और उससे अल्लाह की पनाह चाहना ईमान की निशानी है।

क्या एक ही दुआ रोज़ पढ़ना काफी है?
अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने मुख्तलिफ़ हालात के लिए दुआएं सिखाई हैं। हालाँकि एक मुस्तनद दुआ को यकीन के साथ बार-बार पढ़ना मुफीद है, लेकिन सुन्नत के मुताबिक़ मसनून अज़कार (जैसे सुबह-शाम की दुआएं) पढ़ना हिफ़ाज़त के लिए ज़्यादा बेहतर और मुकम्मल तरीका है।

Aakhiri Baatein

शैतान हमारा दुश्मन ज़रूर है, लेकिन उसका मक्र और फरेब अल्लाह के ज़िक्र के सामने निहायत कमज़ोर है। असल चीज़ अल्लाह की जात पर अटूट भरोसा और अपनी नीयत की पाकीज़गी है। जब हम सिदक़-ए-दिल से अल्लाह की पनाह मांगते हैं, तो वह हमें तन्हा नहीं छोड़ता। हिम्मत न हारें और हर वसवसे के जवाब में अल्लाह की तरफ रुजू करें, क्योंकि अल्लाह की रहमत हर चीज़ पर ग़ालिब है।