ईमान की सलामती एक मोमिन के लिए सबसे बड़ी दौलत है। जब एक इंसान अल्लाह की वहदानियत (अकेला होना) पर कामिल यक़ीन रखता है, तो उसके दिल में यह फ़िक्र होना फ़ितरी है कि उसकी इबादत और अक़ीदा हर तरह की मिलावट से पाक रहे। शिर्क से बचने की दुआ सिर्फ़ कुछ लफ़्ज़ों का मजमुआ नहीं है, बल्कि यह अल्लाह की बारगाह में एक बंदे की आज़िज़ाना पुकार है कि “ऐ रब, मेरे ईमान की हिफ़ाज़त फ़रमा।”
Dil Mein Shirk Ka Khauf Kyun Paida Hota Hai
एक मोमिन के दिल में शिर्क का खौफ़ पैदा होना दरअसल उसके ईमान की ज़िंदा होने की निशानी है। यह कोई दिमागी उलझन या कमज़ोरी नहीं, बल्कि अल्लाह के करीब होने का एक एहसास है। इंसान अपनी फ़ितरत में कमज़ोर है और कई बार बे-ख़्याली में या नियत की कमी की वजह से इंसान का दिल भटक सकता है।
अल्लाह पर कामिल भरोसा रखने का मतलब ही यह है कि हम अपनी इबादतों और नेक कामों को सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी रज़ा के लिए ख़ालिस (pure) रखें। जब बंदा यह महसूस करता है कि उसकी तमाम सलाहियतें और नेमतें अल्लाह की तरफ़ से हैं, तो उसके दिल में यह एहतियात पैदा होती है कि कहीं वह अपनी अना (ego) या दुनियावी दिखावे को अपनी इबादत में शामिल न कर ले। यह एहसास हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें अल्लाह की पनाह में लाने के लिए होता है।
Islam Shirk Se Bachne Ka Kya Usul Sikhata Hai
इस्लाम में तौहीद का तसव्वुर निहायत सादा और गहरा है। इसका असल उसूल यह है कि हर चीज़ का मालिक, खालिक और हाकिम सिर्फ़ अल्लाह सुब्हानहु व तआला है। जब हम अपनी नियत को साफ़ रखते हैं और यह यक़ीन रखते हैं कि नफ़ा और नुक़सान सिर्फ़ अल्लाह के हाथ में है, तो शिर्क के तमाम रास्ते बंद हो जाते हैं।
दुआ का मकाम इसमें सबसे ऊँचा है। अल्लाह तआला ने हमें सिखाया है कि हम अपनी हिफ़ाज़त के लिए उसी से मदद माँगें। शिर्क से बचने का सबसे बड़ा ज़रिया अपनी नियत की बार-बार इस्लाह करना और अल्लाह से हिफ़ाज़त की दुआ माँगते रहना है। यह अमल हमारे दिल को सुकून देता है और हमें इस बात का इत्मीनान दिलाता है कि जब तक हम अल्लाह की पनाह माँग रहे हैं, हमारा ईमान महफूज़ है।
Shirk Se Bachne Ke Liye Padhi Jane Wali Masnoon Dua
नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने सहाबा को वह दुआ सिखाई जो हमारे ईमान को हर तरह के छोटे और बड़े शिर्क से महफ़ूज़ रखने का बेहतरीन ज़रिया है। यह दुआ निहायत जामे है और बंदे की आज़िज़ी को ज़ाहिर करती है।
Arabic Dua
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أُشْرِكَ بِكَ وَأَنَا أَعْلَمُ، وَأَسْتَغْفِرُكَ لِمَا لاَ أَعْلَمُ
तलफ़्फ़ुज़
अल्लाहुम्मा इन्नी अऊज़ु बिका अन उशरिका बिका व-अना अ’लमु, व-अस्तग़फ़िरुका लिमा ला अ’लमु।
Roman (Hinglish)
Allahumma inni a’udhu bika an ushrika bika wa ana a’lam, wa astaghfiruka lima la a’lam.
तर्जुमा
ऐ अल्लाह! मैं तेरी पनाह माँगता हूँ इस बात से कि मैं जान-बूझकर तेरे साथ किसी को शरीक ठहराऊँ, और तुझसे माफ़ी माँगता हूँ उस (शिर्क) के लिए जिसे मैं नहीं जानता।
Masdar (Hadith reference)
(Al-Adab Al-Mufrad, Bukhari: 716 | इसे अल्लामा अल्बानी ने सहीह करार दिया है)
Dua Ke Saath Dil Ka Aitidal
ईमान की राह खौफ़ और उम्मीद के बीच का रास्ता है। जहाँ हमें इस बात का एहतियात होना चाहिए कि हमारा अक़ीदा साफ़ रहे, वहीं हमें अल्लाह की रहमत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए। दीन में सख़्ती या बे-वजह का वहम पालना मना है।
इल्म और दुआ दोनों साथ चलते हैं। जब हम सुन्नत के मुताबिक़ दुआ करते हैं, तो हमारे दिल को एक तरह का इत्मीनान नसीब होता है। हमें यह समझना चाहिए कि अल्लाह हमारे दिलों के हाल से वाक़िफ़ है। अगर कभी दिल में कोई बुरा वसवसा आए, तो उसे अपना गुनाह न समझें बल्कि फ़ौरन अल्लाह की पनाह लें और ऊपर दी गई दुआ का विर्द करें। सुकून इसी में है कि हम अपनी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी अल्लाह के सुपुर्द कर दें।
मुख़्तसर सवाल-जवाब
क्या शिर्क का खौफ़ होना ईमान की कमज़ोरी है?
नहीं, बल्कि यह ईमान की मज़बूती और इख़्लास (sincerity) की अलामत है। सहाबा-ए-किराम जैसे महान लोग भी अपने ईमान के बारे में फिक्रमंद रहते थे। यह फिक्र इंसान को अल्लाह के और करीब ले जाती है।
क्या बिना इल्म के शिर्क का डर ठीक है?
सिर्फ़ डरना काफ़ी नहीं है, सही इल्म हासिल करना ज़रूरी है। जब आप तौहीद का सही मफ़हूम समझ लेते हैं, तो बे-बुनियाद डर ख़त्म हो जाता है और उसकी जगह अल्लाह पर यकीन और मुहब्बत ले लेती है।
Aakhiri Baat
अल्लाह सुब्हानहु व तआला की तौहीद वह नूर है जो इंसान के दिल को रौशन कर देती है। शिर्क से हिफ़ाज़त की दुआ माँगना दरअसल अपनी इस रोशनी को बचाए रखने की कोशिश है। जब हम ख़ालिस नियत के साथ अल्लाह के सामने झुकते हैं, तो वह हमारे ईमान की हिफ़ाज़त खुद फ़रमाता है। अपने दिल में हमेशा यह इत्मीनान रखें कि अल्लाह तआला ग़फ़ूरुर रहीम है और वह अपने बंदों की कोशिशों को ज़ाया नहीं करता। तौहीद पर क़ायम रहना ही असल कामयाबी है और इस पर साबित-क़दमी के लिए दुआ ही सबसे बड़ा सहारा है।


