रात की ख़ामोश इबादत
रात का वह हिस्सा जब पूरी दुनिया सो रही होती है और चारों तरफ सन्नाटा होता है, वह वक्त अल्लाह से चुप-चाप बातें करने का है। नींद से बोझिल आंखों के साथ मुसल्ले पर खड़े होना और अपनी दबी हुई आवाज़ में अपने रब को पुकारना एक अलग ही सुकून देता है। यहाँ कोई दिखावा नहीं होता, सिर्फ आप होते हैं और आपका ख़ालिक़ (बनाने वाला)। तहज्जुद सिर्फ एक नमाज़ नहीं, बल्कि अपनी थकान और अपनी ज़रूरतों को अल्लाह के सामने रखने का एक ज़रिया है।
तहज्जुद क्या है?
तहज्जुद की नमाज़ वह इबादत है जो ईशा के बाद सोकर उठने पर पढ़ी जाती है। यह फ़र्ज़ नहीं है, लेकिन सुन्नत-ए-मुअक्कदा के करीब और अल्लाह की कुर्बत (नज़दीकी) पाने का बेहतरीन रास्ता है। इसका असल वक्त रात के आख़िरी हिस्से में होता है, यानी सुब्ह-सादिक़ (फ़ज्र) से कुछ पहले।
तहज्जुद की नमाज़ का तरीक़ा (Step-by-Step)
तहज्जुद पढ़ने का तरीक़ा बहुत सादा है। इसमें किसी पेचीदगी की ज़रूरत नहीं है:
- नींद से उठना: सुन्नत यह है कि आप ईशा पढ़कर सो जाएं और रात के आख़िरी हिस्से में उठें।
- वज़ू और सफ़ाई: अच्छी तरह वज़ू करें और मिस्वाक या ब्रश कर लें ताकि सुस्ती दूर हो जाए।
- नियत: नियत दिल के इरादे का नाम है। आप दिल में इरादा करें कि “मैं अल्लाह के लिए तहज्जुद की नमाज़ (2 रकात) पढ़ रहा/रही हूँ।” इसके लिए ज़ुबान से कोई ख़ास अल्फ़ाज़ ज़रूरी नहीं हैं।
- रकात: कम से कम 2 रकात और ज़्यादा से ज़्यादा 12 रकात तक पढ़ी जा सकती है। आम तौर पर लोग 8 रकात पढ़ते हैं।
- सलाम: हर दो रकात के बाद सलाम फेरना सबसे अफ़ज़ल और सुन्नत तरीक़ा है।
- क़िरात: इसमें आप अपनी पसंद की कोई भी सूरत पढ़ सकते हैं। अगर आपको लंबी सूरतें याद हैं तो उन्हें पढ़ना बेहतर है, वरना छोटी सूरतों से भी नमाज़ मुकम्मल हो जाती है।
- वितर: अगर आपने ईशा के साथ वितर नहीं पढ़े थे, तो तहज्जुद के आख़िर में वितर ज़रूर पढ़ें।
तहज्जुद में पढ़ी जाने वाली मसनून दुआ
तहज्जुद के बाद अपनी ज़ुबान में दुआ माँगी जा सकती है, लेकिन नबी-ए-करीम ﷺ से साबित दुआएं पढ़ना ज़्यादा बरकत वाला है।
1. अल्लाह की हम्द-ओ-सना (तारीफ़) की दुआ
Arabic:
اللَّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ أَنْتَ نُورُ السَّمَوَاتِ وَالأَرْضِ وَمَنْ فِيهِنَّ
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा लकल हम्दु अन्ता नूरुस-समावाति वल अर्ज़ि व मन फ़ी-हिन्न।
Allāhumma lakal-ḥamdu anta nūrus-samāwāti wal-arḍi wa man fī-hinn.
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! तमाम तारीफ़ें तेरे ही लिए हैं, तू आसमानों, ज़मीन और उनमें रहने वाली तमाम चीज़ों का नूर (रौशनी) है।
मस्दर (Reference):
सहीह बुख़ारी: 1120
2. सैयदुल इस्तग़फ़ार (तौबा की सबसे अफ़ज़ल दुआ)
Arabic:
اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ، خَلَقْتَنِي وَأَنَا عَبْدُكَ، وَأَنَا عَلَى عَهْدِكَ وَوَعْدِكَ مَا اسْتَطَعْتُ، أَعُوذُ بِكَ مِنْ شَرِّ مَا صَنَعْتُ، أَبُوءُ لَكَ بِنِعْمَتِكَ عَلَيَّ، وَأَبُوءُ لَكَ بِذَنْبِي فَاغْفِرْ لِي فَإِنَّهُ لَا يَ1غْفِرُ الذُّنُوبَ إِلَّا أَنْتَ2
तलफ़्फ़ुज़:
अल्लाहुम्मा अन्ता रब्बी ला इला-ह इल्ला अन्ता, ख़लक़्तनी व अना अब्दुका, व अना अला अहदिका व वअदिका मस्ततअतु, अऊज़ु बिका मिन शर्रि मा सनअतु, अबू-उ लका बि-निअमतिका अलैया, व अबू-उ लका बि-ज़म्बी फ़ग़फ़िरली फ़-इन्नहू ला यग़फ़िरुज़्ज़ुनू-ब इल्ला अन्ता।
Allāhumma anta Rabbī lā ilāha illā anta, khalaqtanī wa ana ‘abduka, wa ana ‘alā ‘ahdika wa wa‘dika mastaṭa‘tu, a‘ūdhu bika min sharri mā ṣana‘tu, abū’u laka bi-ni‘matika ‘alayya, wa abū’u laka bi-dhambī faghfirlī fa-innahu lā yaghfiru-dhunūba illā anta.
तर्जुमा:
ऐ अल्लाह! तू ही मेरा रब है, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं। तूने ही मुझे पैदा किया और मैं तेरा बंदा हूँ। मैं अपनी ताक़त के मुताबिक़ तेरे अहद और वादे पर कायम हूँ। मैं अपने उन कामों के शर (बुराई) से तेरी पनाह चाहता हूँ जो मैंने किए। मैं तेरे सामने उन नेमतों का इक़रार करता हूँ जो तूने मुझे दीं और अपने गुनाहों का एतराफ़ (क़बूल) करता हूँ, लिहाज़ा मुझे माफ़ कर दे, क्योंकि तेरे सिवा कोई गुनाहों को माफ़ करने वाला नहीं।
मस्दर (Reference):
सहीह बुख़ारी: 6306
तहज्जुद के आदाब
इस इबादत में सादगी और सुकून बनाए रखने के लिए इन बातों का ख़्याल रखें:
- इख़्लास: अपनी इबादत को पोशीदा (छुपाकर) रखें। इसका ज़िक्र दूसरों से करने की ज़रूरत नहीं है।
- ख़ामोशी: नमाज़ के दौरान और दुआ मांगते वक्त अपनी आवाज़ को बहुत धीमा रखें।
- तवक्कुल: अल्लाह से जो भी मांगें, पूरे यकीन के साथ मांगें कि वह सुन रहा है।
- इस्तिक़ामत: अगर आप रोज़ नहीं उठ पाते, तो हफ़्ते में एक या दो बार से शुरुआत करें, लेकिन उसे जारी रखें।
सवाल और जवाब (Q&A)
क्या रोज़ तहज्जुद पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं, यह एक नफ़्ल इबादत है। अगर आप किसी दिन थकन की वजह से नहीं उठ पाते, तो इसमें कोई गुनाह नहीं है।
अगर कम रकात पढ़ें तो क्या नमाज़ होगी?
जी हाँ, अगर वक्त कम हो या आप थक गए हों, तो सिर्फ 2 रकात तहज्जुद भी काफी है। अल्लाह नीयत देखता है, तादाद नहीं।
क्या बिना सोए तहज्जुद पढ़ सकते हैं?
तहज्जुद का असल तरीक़ा सोकर उठना ही है। अगर आप सोए बिना रात को इबादत करते हैं, तो उसे ‘नमाज़-ए-लैल’ कहा जाएगा, जिसका भी सवाब है, लेकिन तहज्जुद की असली फ़ज़ीलत नींद कुर्बान करने में है।
ख़ामोशी में जुड़ाव
तहज्जुद की असल रूह इख़्लास है। जब आप अपनी नींद छोड़कर ठंडे पानी से वज़ू करते हैं और अंधेरे में अपने रब के सामने झुकते हैं, तो वह लम्हा अल्लाह से आपके क़रीब होने का सबसे सच्चा वक़्त होता है। अपनी इस छोटी सी कोशिश में सादगी और इस्तिक़ामत रखें। अल्लाह हम सबको इस ख़ामोश इबादत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।


