तरावीह क्या है और क्यों पढ़ी जाती है?
रमज़ान का चाँद नज़र आते ही मुसलमानों के घरों और मस्जिदों में एक अलग रौनक आ जाती है। दिन में रोज़े की पाबंदी और रात में क़याम, यही इस महीने की ख़ूबसूरती है। ईशा की नमाज़ के बाद जो ख़ास नमाज़ पढ़ी जाती है, उसे ‘तरावीह’ कहते हैं।
यह नमाज़ सिर्फ़ उठना और बैठना नहीं है, बल्कि पूरे साल में एक मर्तबा क़ुरान मजीद सुनने और सुनाने का बेहतरीन ज़रिया है। मस्जिद में जमात के साथ लंबी रकातें पढ़ना, थकान के बावजूद खड़े रहना और इमाम साहब की क़िराअत पर ग़ौर करना—यह सब मिलकर इंसान के दिल में अल्लाह की मुहब्बत पैदा करता है।
तरावीह के दरमियान पढ़ी जाने वाली दुआ
हिंदुस्तान और पाकिस्तान में आम तौर पर रिवाज़ है कि तरावीह की हर 4 रकात के बाद थोड़ी देर रुकते हैं। इस वक़्फ़े (Break) को ही ‘तरावीहा’ कहते हैं, जिसका मतलब है ‘आराम करना’। ताकि लोग थोड़ा सुकून ले सकें और अगली रकातों के लिए ताज़ा-दम हो जाएं।
इस वक़्फ़े के दौरान लोग ख़ामोश भी रहते हैं, ज़िक्र भी करते हैं, या नफ़िल नमाज़ पढ़ते हैं। लेकिन अक्सर मस्जिदों में सब मिलकर एक ख़ास तस्बीह या दुआ पढ़ते हैं। इसे लोग ‘तरावीह की दुआ’ के नाम से जानते हैं। इसका मक़सद अल्लाह की पाकी बयान करना और जन्नत की तलब करना होता है।
मशहूर तरावीह की दुआ (रिवाज़ के तौर पर)
यहाँ यह बात साफ़ समझ लेनी चाहिए कि हदीस से तरावीह के वक़्फ़े के लिए कोई मख़सूस (Fix) दुआ साबित नहीं है। जो दुआ हमारे यहाँ मशहूर है, वो बुज़ुर्गों और उलेमा ने अल्लाह की तारीफ़, बुज़ुर्गी और दुआ के लिए चुनी है। इसे पढ़ना अच्छा है, सवाब का काम है, लेकिन इसे सुन्नत या फ़र्ज़ समझना सही नहीं होगा। यह रिवाज़ और नसीहत के तौर पर पढ़ी जाती है।
यहाँ वह दुआ दी जा रही है जो आम तौर पर मस्जिदों और दीनी किताबों में मिलती है:
अरबी दुआ (Arabic Text)
سُبْحَانَ ذِي الْمُلْكِ وَالْمَلَكُوتِ سُبْحَانَ ذِي الْعِزَّةِ وَالْعَظَمَةِ وَالْهَيْبَةِ وَالْقُدْرَةِ وَالْكِبْرِيَاءِ وَالْجَبَرُوتِ سُبْحَانَ الْمَلِكِ الْحَيِّ الَّذِي لَا يَنَامُ وَلَا يَمُوتُ سُبُّوحٌ قُدُّوسٌ رَبُّنَا وَرَبُّ الْمَلَائِكَةِ وَالرُّوحِ اللَّهُمَّ أَجِرْنَا مِنَ النَّارِ يَا مُجِيرُ يَا مُجِيرُ يَا مُجِيرُ بِرَحْمَتِكَ يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِينَ
तलफ़्फ़ुज़ (Hindi Pronunciation)
सुब्हाना ज़िल मुल्कि वल मलकूत, सुब्हाना ज़िल इज़्ज़ति वल अज़मति वल हैबति वल क़ुद्रति वल किबरियाई वल जबरूत।
सुब्हानल मलिकिल हैय्यिल लज़ी ला यनामु व ला यमूत, सुब्बुहुन क़ुद्दुसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वर-रूह।
अल्लाहुम्मा अजिरना मिनन-नार, या मुजीरु या मुजीरु या मुजीरु, बि-रहमतिका या अरहमर राहिमीन।
रोमन इंग्लिश (Roman Hinglish)
Subhana Zil Mulki Wal Malakoot, Subhana Zil Izzati Wal Azamati Wal Haibati Wal Qudrati Wal Kibriyaai Wal Jabroot.
Subhanal Malikil Hayyil Lazee La Yanaamu Wa La Yamoot, Subbuhun Quddusun Rabbuna Wa Rabbul Malaaikati War-Rooh.
Allahumma Ajirna Minan-Naar, Ya Mujeeru Ya Mujeeru Ya Mujeeru, Bi-Rahmatika Ya Arhamar Rahimeen.
तर्जुमा (Translation)
“पाक है वह (अल्लाह) जो मुल्क और मलकूत (ज़मीन और आसमान की बादशाहत) का मालिक है।
पाक है वह जो इज़्ज़त, बड़ाई, हैबत, क़ुदरत, किबरियाई (बड़प्पन) और दबदबे वाला है।
पाक है वह बादशाह जो ज़िन्दा है, जिसे न नींद आती है और न मौत। वह बहुत पाक और बहुत मुक़द्दस है, हमारा रब और फरिश्तों और रूह (जिब्रील अमीन) का रब।
ऐ अल्लाह! हमें आग (जहन्नम) से पनाह दे, ऐ पनाह देने वाले, ऐ पनाह देने वाले, ऐ पनाह देने वाले। तेरी रहमत के वास्ते, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।”
तरावीह में असल चीज़ क्या है?
बाज़ औक़ात लोग इस बात पर परेशान होते हैं कि उन्हें यह तरावीह की दुआ याद नहीं है। याद रखें, तरावीह की असल रूह क़िराअत सुनना और नमाज़ पढ़ना है। बीच में जो वक़्त मिलता है, उसमें कोई भी ज़िक्र किया जा सकता है।
अगर किसी को यह लंबी तस्बीह याद न हो, तो वो सुब्हान अल्लाह, अलहम्दुलिल्लाह, या दुरूद शरीफ़ पढ़ ले। यहाँ तक कि ख़ामोश रहना भी दुरुस्त है। असल चीज़ ज़बान की रटन नहीं, बल्कि दिल का अल्लाह की तरफ़ मुतवज्जे होना है।
ज़रूरी सवाल-जवाब (Common Questions)
क्या तरावीह की दुआ पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं, यह पढ़ना ज़रूरी या वाजिब नहीं है। यह एक अच्छा अमल है जो रिवाज़ में आ गया है, लेकिन इसके बिना भी तरावीह मुकम्मल मानी जाती है।
अगर दुआ न पढ़ी जाए तो क्या तरावीह हो जाती है?
जी हाँ, बिलकुल। तरावीह एक नमाज़ है और यह दुआ नमाज़ के बाद के वक़्फ़े (Break) का हिस्सा है। अगर आप दुआ नहीं पढ़ते, तब भी नमाज़ पर कोई असर नहीं पड़ता।
क्या घर पर भी यह दुआ पढ़ी जा सकती है?
अगर आप घर पर अकेले या घर वालों के साथ तरावीह पढ़ रहे हैं, तो आप यह दुआ पढ़ सकते हैं। अगर याद न हो तो कोई और दुआ मांग लें या सिर्फ़ अस्तग़फ़ार (तौबा) कर लें।
आख़िरी बात: ख़ुशू, सब्र और तरावीह
रमज़ान की रातों में थकान होना फ़ितरी बात है। दिन भर का रोज़ा और रात में देर तक जागना आसान नहीं होता। लेकिन यही वो वक़्त है जब बंदा अपने रब को राज़ी करता है। जब आप तरावीह में खड़े हों, तो कोशिश करें कि ध्यान क़िराअत पर रहे। दुआ याद हो या न हो, आपका दिल अल्लाह से जुड़ा होना चाहिए। अल्लाह हम सबकी टूटी-फूटी इबादत और कोशिशों को क़ुबूल फ़रमाए।


