Quick Summary
Dua Name
Zalzale Ki Dua
Arabic Text
لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
Hindi Transliteration
ला इलाह इल्ला अन-त सुब-हानक इन्नी कुन-तु मिनज़-ज़ालिमीन
English Transliteration
La ilah illa an-t sub-hanak inni kun-tu minaz-zalimin
Source
सूरह अल-अंबिया (21:87) | जामे तिरमिज़ी
जब अचानक पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने लगे, घर की दीवारें हिलने लगें और छत कांपने लगे, तो बड़े से बड़े इंसान का दिल भी ख़ौफ़ से भर जाता है। ज़लज़ला (Earthquake) एक ऐसी क़ुदरती आफ़त है जो बिना किसी आहट के आती है और चंद सेकंड में इंसान को उसकी बेबसी का अहसास दिला देती है।
अचानक आने वाले झटकों से घबरा जाना और अपने घर वालों की फ़िक्र होना एक बिल्कुल फ़ितरी (Natural) बात है। लेकिन ऐसे नाज़ुक हालात में इस्लाम हमें पैनिक होने या चीखने-चिल्लाने के बजाय, अपने रब्ब की तरफ़ रुजू करने की तालीम देता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि ज़मीन हिलने पर क्या पढ़ना चाहिए और Zalzale ki dua क्या है, तो इस मुकम्मल गाइड को ज़रूर पढ़ें।
ज़लज़ले के वक़्त एक मोमिन का रवैया
ज़लज़ला आने पर इंसान अक्सर अपनी जान बचाने के लिए भागता है, जो कि ज़रूरी भी है। लेकिन एक मोमिन (मुसलमान) का यक़ीन यह होता है कि क़ायनात का हर ज़र्रा और ज़मीन का हर हिस्सा अल्लाह के हुक्म का पाबंद है।
ऐसे वक़्त में हमें ज़ाहिरी तौर पर अपनी हिफ़ाज़त (Safety measures) के तरीक़े अपनाने चाहिए और बातिनी (अंदरूनी) तौर पर अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा रखना चाहिए। यह वक़्त अल्लाह की बड़ाई बयान करने, तौबा करने और किसी भी मुसीबत के वक़्त की दुआ को पढ़ने का होता है।
Zalzale Ki Dua (ज़लज़ला आने पर पढ़ी जाने वाली दुआएं)
हदीस की किताबों में ख़ास “ज़लज़ले” के नाम से कोई एक मुक़र्रर दुआ नहीं है। लेकिन, नबी-ए-करीम (ﷺ) ने अचानक आने वाली आफ़तों, घबराहट और बेबसी के हालात में जो दुआएं सिखाई हैं, उलमा-ए-कराम ज़लज़ले के वक़्त उन्हीं दुआओं को पढ़ने की ताकीद करते हैं।
यहाँ 2 सबसे ताक़तवर और मोअतबर (Authentic) दुआएं दी जा रही हैं:
1. आयत-ए-करीमा (सख़्त परेशानी और मुसीबत की दुआ)
यह हज़रत यूनुस (अलैहिस सलाम) की वह मशहूर दुआ है जो उन्होंने मछली के पेट के अंधेरे में पढ़ी थी। अल्लाह ने क़ुरआन में फरमाया है कि इसी दुआ की बरकत से उन्हें निजात मिली। जब ज़मीन हिले और जान का ख़तरा महसूस हो, तो कसरत से यह दुआ पढ़ें:
अरबी (Arabic):
لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنْتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنْتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
रोमन इंग्लिश (Roman):
La ilaha illa Anta Subhanaka Inni Kuntu Minaz-Zalimeen.
हिंदी तलफ़्फ़ुज़:
ला इला-ह इल्ला अन्त सुब्हा-न-क इन्नी कुन्तु मि-नज़्ज़ालिमीन।
तर्जुमा:
“तेरे सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, तेरी ज़ात पाक है; बेशक मैं ही क़ुसूरवारों (ज़्यादती करने वालों) में से हूँ।”
(हवाला: सूरह अल-अम्बिया, आयत 87)
2. डर और घबराहट में अल्लाह पर भरोसे की दुआ
जब झटके तेज़ हों और कुछ समझ न आए कि कहाँ जाएं, तो दिल में अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसे) को मज़बूत करने के लिए यह छोटी लेकिन निहायत ताक़तवर दुआ पढ़ें। यह दुआ हज़रत इब्राहीम (अलैहिस सलाम) ने आग में डाले जाते वक़्त पढ़ी थी:
अरबी (Arabic):
حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ
रोमन इंग्लिश (Roman):
Hasbunallahu Wa Ni’mal Wakil.
हिंदी तलफ़्फ़ुज़:
हस्बु-नल्लाहु व नेअ-मल वकील।
तर्जुमा:
“हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है, और वह बेहतरीन कारसाज़ (हिफ़ाज़त करने वाला/काम बनाने वाला) है।”
(हवाला: सहीह बुख़ारी)
ज़लज़ले के झटकों के दौरान हिफ़ाज़त और एहतियात (Safety)
दुआ पढ़ने का मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि आप ख़तरे की जगह खड़े रहें। इस्लाम हमें अपनी जान की हिफ़ाज़त का भी हुक्म देता है:
- महफ़ूज़ जगह तलाश करें: अगर आप किसी इमारत के अंदर हैं, तो किसी मज़बूत मेज़ (Table) या पलंग के नीचे छुप जाएं और अपने सर को हाथों से ढँक लें।
- बाहर हैं तो खुले में रहें: अगर आप घर से बाहर हैं, तो इमारतों, बिजली के खंभों और पेड़ों से दूर खुले मैदान में चले जाएं।
- दुआ का विर्द: भागते या छुपते वक़्त अपनी ज़बान पर अल्लाह का ज़िक्र जारी रखें। अगर ज़लज़ले से दिल में बहुत ज़्यादा ख़ौफ़ बैठ गया है, तो आप इत्मीनान के लिए घबराहट और ख़ौफ़ से बचने की दुआ भी पढ़ सकते हैं।
ज़लज़ले के बाद (Aftershocks) का ख़ौफ़ कैसे दूर करें?
अक्सर मेन ज़लज़ला रुक जाने के बाद भी ‘आफ़्टरशॉक्स’ (Aftershocks) का डर नींद और सुकून छीन लेता है। बार-बार ऐसा लगता है कि जैसे ज़मीन फिर हिल रही है।
ऐसी कैफ़ियत में बार-बार न्यूज़ चैनल्स देखकर घबराने के बजाय घर में क़ुरआन मजीद की तिलावत करें। अगर दिल बहुत बेचैन हो, तो दिल के सुकून और इत्मीनान की दुआ पढ़ें। एक-दूसरे को हिम्मत बंधाएं और याद रखें कि अल्लाह की हिफ़ाज़त का दायरा हमारी सोच और हमारे डर से कहीं ज़्यादा बड़ा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQs)
सवाल: क्या ज़लज़ला अल्लाह का अज़ाब (Punishment) होता है?
जवाब: हर ज़लज़ला अज़ाब नहीं होता। क़ुरआन और हदीस की रौशनी में यह अल्लाह की ताक़त की एक निशानी (Sign) है, जो बंदों को यह याद दिलाती है कि वे अपनी ग़लतियों से तौबा करें और अल्लाह की तरफ़ लौटें। इसे सिर्फ़ सज़ा समझने के बजाय हिदायत का ज़रिया समझना चाहिए।
सवाल: क्या ज़लज़ले के वक़्त अपनी मादरी ज़बान (हिंदी/उर्दू) में दुआ मांग सकते हैं?
जवाब: बिल्कुल। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हर ज़बान और हर दिल का हाल बख़ूबी जानता है। अगर आपको अचानक घबराहट में अरबी दुआ याद न आए, तो आप अपनी ज़बान में अल्लाह को पुकारें और उससे सलामती की दुआ मांगें।
अल्लाह ताला हम सबको, हमारे मुल्क को और तमाम उम्मत को हर तरह की कुदरती आफ़तों और नागहानी बलाओं से महफ़ूज़ रखे। आमीन।



